Wednesday, April 23, 2014

मेरे माथे पर छपा एक विज्ञापन।

इस शख्स का नाम विनीत,
उम्र तीस,
रंग गेहुँआ,
कद दरम्याना,
चेहरा गोल
है,
बाँयी पलक पर
,
चोट का निशान,
असमय बाल झड़ने से,
सर पर बना खाली स्थान,
और बदन बेडोल है।
शक्ल से बेतरतीब,
और बेवजह बद्तमीज़,
लगने वाला ये शख्स,
पिछले कई... हफ्तों से,
हकीकत से लापता है।
और अभी इसकी गुमशुदाई का,
इसे खुद भी कहाँ पता है।
आखिऱी बार इसे,
ख़यालों के मुहाने पर पाया गया था,
और उस रोज़ भी,
इसे समझाया गया था,
पर ये ठहरा बेवकूफ, अड़ गया,
फिज़ूल चक्करों में पड़ गया,
और पल-पुसकर जब किसी काम लायक ये हो गया,
उसके बाद ये खो गया।

इसे ढूँढने वाले का ये इनाम है,
कि इसे ढूँढने वाले को, ये इनाम है।
इसे ढूँढें,
और सबसे पहले,
तो इसे, इसके खोने की इक्तला दें,
फिर हक से,
हर मुद्दे पर इसे सलाह दें।
इससे इसके बारे में,
जो मर्जी व्यक्तिगत सवाल पूछें,
इसे सार्वजनिक संपत्ति समझें,
और बेझिझक पूरा इतिहास पूछें।

इसकी संपत्ति का ब्यौरा लें,
इसकी आमदनी का हिसाब लगायें,
इसके खर्चे जोड़ें,
फिर इसे छोड़ें,
और बाकी सबसे इसके बारे में मशवरा करें,
पंचायत जमा लें,
और मिलज़ुल कर इस पर फैसला करें।
इसे अपना समझें,
और अपनी समझायें,
और इसकी किसी बात में ना आयें।
इसकी पढ़ाई-लिखाई सब नकार दें,
इसकी सोच को दुत्कार दें,
ज़रूरत पड़े, तो दो चार थप्पड़ ही क्यों ना मार दें।
इसकी क्या ख़ता,
और इसे क्या पता,
इसे आपकी नसीहतों की कितनी सख़्त ज़रूरत है।
आप ऐवरेस्ट छूकर आये हैं,
चाँद पर आपका आना जाना है।
हर विषय पर आपने पी एच डी की है,
सर्व प्रकार से आप क्वालिफाईड हैं,
आपने दुनिया देखी है।
इसका क्या है,
जैसे तैसे तीस का हो गया,
और तीस का होते ही तो खो गया।
इसकी ज़िंदगी की बागडोर,
बस अब, आप अपने हाथ में ले लें,
और इससे पहले कि ये कुछ कर गुज़रे,
इसे भी अपने ही साथ में ले लें।
इतिहास गवाह है,
इतिहास, आपने बनाया है,
ज़िंदगी भर आपने इतिहास को,
और इतिहास ने आपको दोहराया है।
इसलिये, इसके जीवन को भी आप,
अपने जैसा ही खास कर दें,
इसे जहाँ कहीँ देखें,
इसे अपनी सलाह दें,
और इसे भी अपने जैसा ही इतिहास कर दें। 

Thursday, January 30, 2014

घुटने भर की, टेक बहुत हूँ, बेबी बस मैं, एक बहुत हूँ।

मैं उठती हूँ, छैः बजते हैं।
छैः बजते हैं,
सूरज आता।
सूरज आता,
सुबह फूटती।
सुबह फूटती,
तो माँ उठती।
मैं ना उठती,
तो माँ उठती ?

भरी रात, जी भर सोती हूँ,
छैः घंटे तक,
चुप होती हूँ।
उठती हूँ,
उठते रोती हूँ,
कब की जो
भूखी होती हूँ।
जो ना रोती,
भूखी सोती,
नींद की अपनी,
नाव डुबाकर,
देता कोई दूध,
उठाकर।

दिन छोटे हैं, काम बड़े हैं,
सब के सब,
निफराम पड़े हैं,
मुझको फुर्सत,
ज़रा नहीं है।
कुछ भी अब तक,
करा नहीं है।
घूम-घूम ज़रा,
घर तो देखूँ,
उठक-पटक,
भर-नज़र तो देखूँ,
इत्ती लंबी,
रात गई है,
बेफिक्रों के,
साथ गई है।
छोटी हूँ,
है बड़ी फिकर पर,
रात गया कुछ,
इधर-उधर गर,
और कौन जो,
ध्यान करेगा,
ये सब क्या,
मेहमान करेगा।

पकड़-पकड़ गर बाल ना खींचूँ,
कान ना ऐंठूँ, नाक ना भींचूँ।
विजयी-विश्व नींद का हारा,
उठ जाता ये कुनबा सारा
?

औ’ बड़े बड़े ये,
रोज़ लड़ें ये,
सुबह जो मैं, अख़बार ना फाड़ूँ,
हर पन्ना, हर बार ना फाड़ूँ,
देश-जहाँ की फ़िकर के मारे,
पढ़ पाते, सब संग ये सारे।

अभी तो इतनी, छोटी हूँ मैं,
फिर भी मुश्किल,
रोती हूँ मैं।
बड़ों के जितनी,
बड़ी जो होती,
आसमान तक,
खड़ी जो होती,
पलक झपकती,
निपटा देती,
हर उलझन को,
सुलझा देती।

पापा खाली, मम्मी खाली,
बात बनाते,
बड़ी बबाली।
पापा का क्या,
दफ्तर जाना।
मम्मी का क्या,
लंच लगाना।
घर तो पूरा,
मुझे चलाना।

मैं चलती, तो मम्मी चलती,
मैं चलती,
तो पापा चलते।
मैं चलती,
तो अम्मा चलती,
मैं चलती,
तो बाबा चलते,
उंगली मेरी,
थाम संभलते।
मैं ना चलती,
तो ये चलते ?
बैठे रहते,
खाट पकड़कर,
हाथ में अपने,
हाथ पकड़कर।


सोच रहे हैं, पाल रहे हैं,
चार ये मुझे,
सम्हाल रहे हैं।
कोई कह दे,
इनसे जाकर,
और लगा दें,
चार यहाँ पर।
घुटने भर की,
टेक बहुत हूँ,
बेबी बस मैं,
एक बहुत हूँ। 

Saturday, June 29, 2013

फौज।

(dedicated to my 7 months old daughter 'Suvi' ) 
डेढ़ फीट की फौज है,
हर तरफ मन मौज है।
कुछ भी लो और तोड़ दो,
उथल-पुथल के छोड़ दो,
घुटनों के बल,
बस चल निकल,
पलंग के नीचे से हो,
फ्रिज के पीछे से हो,
कोना कोई निकाल ले,
मोर्चा संभाल ले।

दुश्मन जो आये खोजता,
निहत्था, तुझको सोचता,
वीरता से वार कर,
चित खाने चार कर,
दुश्मन की दाढ़ी ले पकड़,
कान कर अकड़-मकड़,
अंगूठे दोनों चाब ले,
हिले तो नाक दाब ले
,
और गीले जो निशान हों,
किला फतह की शान हों।

हथियार अपने डारकर,
हार को स्वीकार कर,
दुश्मन कहे के अर्ज है,
कि बेटे कहना फर्ज है,
पेट में कुछ डाल ले,
फिर मोर्चा संभाल ले।

बारह बजे हों रात हो,
फौज पर तैनात हो,
पाँच फीट समेट कर,
घुटने दोनों टेक कर,
दुश्मन कहे ये सहम कर,
के दस मिनट तो रहम कर,
देर कुछ तो साँस ले,
दुश्मन बेचारा हाँफ ले,
ये फौजदारी कल जो कर,
ये युद्ध जारी कल जो कर।


फौज का एहसान है,
कि फौज भी इंसान है,
इंसानियत में डूबकर,
कभी भूल-चूककर,
फौज जो हो सो रही,
तैयार फिर से हो रही,
दुश्मन शुक्रगुज़ार हो,
कि झपकी एक मार लो,
कि अब तो आँख लग गई,
फौज फिर जो जग गई,
फौज तो फिर फौज है,
फौज पर क्या रौब है। 

Sunday, March 3, 2013

लाईसैंस


जज साहब,
ये साहब
जो कठघरे में भोले बने खड़े हैं,
इनके कारनामे, इनके कद से भी बड़े हैं,
ये कहते हैं,
ये बेकुसूर हैं,
बकवास...,
हकीकत ये है,
कि ये हकीकत से कोसों दूर हैं।

कानून ने इन्हें कविता लिखने की इज़ाजत दी,
इन्होंने कहानी लिख दी,
इनसे कहा था, कुछ नया लिखना,
इन्होंने फिर भी, बात वही पुरानी लिख दी।

जज साहब,
इन पर इल्ज़ाम है,
कि ये सोचते हैं।
हमारे पास सबूत हैं,
हमारे पास गवाह हैं,
कि इन्हें दिन दहाड़े,
फत्तो बावरी चौक पे,
भरे बाज़ार,
बेधड़क, बेखौफ, बेमतलब और बेकार,
सर के बाल नोचते हुये पाया गया,
सरेआम सोचते हुये पाया गया।
और जब इन्हें रोका गया,
बतौर मश़वरा टोका गया,
तो ये अपने आपे से बाहर हो गये,
बताइये,
कानूनी लोगों पर,
कानून लेकर सवार हो गये।
चार लफ्ज़ क्या पढ़ लिख लिये,
ये लिखा-पढ़ी पर उतर गये,
हमारा लिखा हुआ संविधान पढ़ा,
और हमीं पर चढ़ गये।

जज साहब,
ये न सिर्फ सोचते हैं,
बल्कि कुछ भी सोचते हैं।
सबसे पहले तो इन्होंने खुद को,
इंसान सोच लिया,
फिर साँस लेने की रियायत को
 खुदा का फरमान सोच लिया,
और जज साहब हद तो तब हो गई,
जब इन्होंने, देश की लोकतांत्रिक सरकार को,
लोकतांत्रिक सरकार सोच लिया,
औ बताईये,
इन्हें सोचने की ज़रा सी छूट क्या मिली,
इन्होंने तो सोचने को ही अपना बुनियादी अधिकार सोच लिया।

जज साहब,
गर ये सोचते,
और बस सोच के छोड़ देते,
तो भी हम मुद्दे को,
मुकद्मा बनने से पहले ही तोड़ देते,
पर इनकी हिमाकत देखिये,
ये न सिर्फ सोचते हैं,
बल्कि ये तो अपनी सोच के,
अमली जामे भी खोजते हैं।
इनकी सोच के एक सौ चालीस कैरैक्टरों से,
इतने पंगे हो गये,
कि इनके फेसबुक स्टेटसों से,
सांप्रदायिक दंगे हो गये,
और जज साहब,
इनकी सोच से तो देवी देवता तक नंगे हो गये।
गर हम इन्हें वहीँ ना रोक लेते,
ये तो पता नहीं और क्या-क्या सोच लेते।

ये कहते हैं,
कि ये लिबरल हैं, मॉडर्न हैं, आर्टिस्ट हैं,
बकवास,
दरअसल ये फार्सिस्ट हैं।
ये सोचते हैं,
कि ये फ्रीडम ऑफ एक्सप्रैशन की दुहाई देंगे,
और बस सोच लेंगे।
लेकिन ये ये नहीं जानते,
कि लोकतंत्र में जिसका पलड़ा भारी है,
बस वही सरकारी है।
कानून उसकी हवाई चप्पल है,
और संविधान उसकी ब्याहता नारी है,
और इन्हें ज़रूरत क्या है कि ये कुछ भी सोचें,
इसके लिये तो हमारे पास पे-रोल पर अधिकारी हैं,
और इन्होंने सोच-सोचकर उसके पेट पे लात मारी हैं,
इसलिये जज साहब,
न केवल इनका सोचा हुआ ही निरस्त किया जाये,
बल्कि इनका सोचने का लाईसैंस भी ज़ब्त किया जाये,
न रहेगी सोच,
न लगेगी मोच। 

Sunday, January 13, 2013

शोकथाम।


ढोल बज गया है।
मंच सज गया है।
माईक में चिल्ला कर दखो,
स्टेज पूरा हिला कर देखो,
अभी-अभी बस पता चला है,
बलात्कार पर शोक सभा है।

दिल्ली में एक रेप हुआ है,
महिला पर आक्षेप हुआ है,
बलात्कारी तो भाग गया है,
लेकिन, देश तो जाग गया है।
इसीलिये तो शोकसभा है,
अभी-अभी तो पता चला है।

चारों ओर कोहराम मचा है,
कोना कोई कहाँ बचा है,
ऐसा हस्तक्षेप हुआ है,
देश में पहला रेप हुआ है,
इसीलिये तो शोकसभा है,
अभी-अभी तो पता चला है।

मुनियों, गुणियों, ज्ञान का भारत,
माता सम सम्मान का भारत,
वो भारत जो जगत-गुरू है,
हाय.. वहाँ भी रेप शुरू है,
इसीलिये तो शोकसभा है,
अभी-अभी तो पता चला है।

मंच पे अब तो चढ़ना ही होगा,
भाषण भी एक पढ़ना ही होगा,
चिल्लाना होगा चीत्कार,
बंद करो बस अत्याचार।
इसीलिये तो शोकसभा है,
अभी-अभी तो पता चला है।

पत्रकार भी बुलाने ही होंगे,
आँसू चार बहाने ही होंगे,
होगा थोड़ा सोच-विचार,
वादे भी तो होंगे चार,
इसीलिये तो शोकसभा है,
अभी-अभी तो पता चला है।

देश में पूरे एक ही मत है,
कुछ भी हो, पर रेप गलत है।
फूँको गाड़ी, तोड़ो कार,
रेपों को पर रोको यार,
इसीलिये तो शोकसभा है,
अभी-अभी तो पता चला है।

ज्ञानी, ध्यानी, नेता बेमानी,
बाबा, अम्मा, नाना-नानी,
सबका एक-एक,
साक्षात्कार।
इसीलिये तो शोकसभा है,
अभी-अभी तो पता चला है।

पहले भ्रष्टों पर शोक हुआ था,
फिर आतंकवाद का विरोध हुआ था,
और आज का मुद्दा,
बलात्कार।
इसीलिये तो शोकसभा है,
अभी-अभी तो पता चला है।

Sunday, September 30, 2012

एक रोमैंटिक कविता।

   कवि से कवि की पत्नी बोली,
मेरे प्रियवर मेरे हमझोली,
ये हास्य-व्यंग्य अब बहुत हुआ,

और सत्-प्रसंग सब बहुत हुआ,
शब्दों में तुम्हारे भार है पर,
बोलो कविता में, प्यार किधर।

कुछ लिखो अपने प्यार पे भी,
हम दोनों के संसार पे भी,
कुछ शब्द कहो मेरी आँखों पर,
कुछ मीठी मेरी बातों पर।
मुझे फूल कहो या चाँद कहो,
या धूप में ठंडी छाँव कहो,
या कह दो, मैं हूँ सोन परी,
आकाश से धरती पर उतरी,
चलदूँ तो वक्त ठहर जाये,
ना साँझ घिरे, ना सहर आये।
हँसती हूँ, झड़ते हैं मोती,
मैं ही हूँ आशा की ज्योति,
मुझसे रौशन है जहान, कहो,
कभी प्यार से मुझको, जान कहो।

लिखो की मुझ पर मरते हो,
बस कहने ही से मुकरते हो,
उपमा ना सही, अनुप्रास सही,
कुछ सच हो, कुछ बकवास सही।
कुछ रोमैंस से भी तो पृष्ठ भरो,
कवि हो कविता कुछ मुझ पे करो।
या कहदो मुझसे प्यार नहीं,
या आर नहीं या पार नहीं।

सारी खुदाई एक तरफ,
पत्नी की दुहाई एक तरफ।
कवि ने सारी हिम्मत जोडी,
और सोच के, यूँ चुप्पी तोड़ी,
कि पत्नी जी तुमसे प्यार बहुत,
शब्दों का भी अंबार बहुत,
कमतर नहीं जानो नीयत भी,
जायज़ है बड़ी नसीहत भी,
रस भी, श्रंगार सजा डालूँ,
उपमा-अनुप्रास लगा डालूँ।
दे डालूँ तुमको नाम कई,
प्रियता, परीणिता, प्रेममयी।
रख दूँ दिल अपना, पन्नों पर,
लिख भी डालूँ, कविता तुझ पर,
बोलो उससे भी क्या होगा,
कागज़ पर अक्षर स्याह होगा।

मैं तो कवि बस शब्दों का,
वही पन्द्रह-सत्रह जज़्बों का,
तुम रचती नित नूतन रचना,
चेतन, सजीव, नहीं-कल्पना।
तुमसे पहले जब जीता था,
जीना भी एक फजीता था,
अब संग तुम्हारा जीता है,
अब तो जीवन ही कविता है,
अब तुक भी है, और अर्थ भी है,
कहीँ-कहीँ कुछ व्यर्थ भी है,
पर धुन तो है, एक राग तो है,
खाने में रोटी संग साग तो है।
बेजान शब्द कुछ भी लिख कर,
मैं क्या बोलूँ, कविता तुम पर।
बेनामी के पीछे गुम हो,
कवयित्री तो दरअसल तुम हो।

कहकर कवि की यूँ, साँस चली,
कुछ देर सही, पर बात टली,
कविता जो नहीं तो नहीं सही,
रोमैंटिक जैसी कुछ बात कही।
अब आप कहो इस दुनिया में,
जहाँ, लोग मिला, जामुनिया में,
कोयला तक काला खा जायें,
और स्पैक्ट्रम को भी चबा जायें,
हमको रोमैंटिक खयाल कभी,
आयें भी तो कैसे आयें।
और दुनिया को समझा भी दें,
पत्नी को कैसे समझायें।
अम्मा, समझो बकरे की है,
कब तक इस दिल को बहकायें।

Friday, July 6, 2012

हम तोप हैं।


हम कौन हैं।
हम.... कौन हैं।
हमें हमारी तारीफ करने के लिये कह रहे हैं,
बाद में
कहियेगा कि साब भावनाओं में बह रहे हैं।

हम तोप हैं।
हम..... तोप हैं..,
और तोप के गोले भी हम खुद ही हैं।
और हमें तोपची की जरूरत थोड़ी है,
हम तो खुद को खुद में भरकर,
खुद ही आग लगा देते हैं।
और दुनिया को बता देते हैं,
कि हम तोप हैं।

आपने कभी हाथी देखा है,
हाथी...,
हाथी चलता है,
कुत्ते भौंकते हैं,
पर हम हाथी थोड़ी हैं,
हम तो तोप हैं,
हम तो खुद चलते हैं,
और खुद भौंकते हैं,
कि हम तोप हैं।

औ’ हम कोई ऐसी वैसी तोप थोड़ी हैं,
ना...
,
हम चलते हैं,
और हमेशा निशाने पे लगते हैं,
हमारे निशाने अचूक हैं,
और हमारी हर जीत के
,
हम खुद ही एक सबूत हैं,
हमें दुनिया के सर्टीफिकेट की जरूरत थोड़ी है,
ना.....
दुनिया क्या जाने तोप,
क्या तोप का गोला..
.।
दुनिया तो ना तोप..,
ना तोप का गोला...।
हम तोप हैं।

हम कहें कि हम चले,
तो हम चले...।
हम कहें कि हम लगे,
तो हम लगे...।
और आपको ना लगे,
तो ना लगे,
हमें कोई अफ्सोस नहीं,
क्यों कि हमें पता है,
इसमें हमारा कोई दोष नहीं।
हम तो श्रेष्ठ हैं,
और श्रेष्ठ क्या,
अलमोस्ट सर्वश्रेष्ठ हैं।


हमारी सफलता से,
दुनिया ओत-प्रोत है,
औ
’ हमारा व्यक्तित्व,
प्रेरणा का जीता जागता स्रोत है,
और आप कहते हैं,
कि हम भावनाओं मे बह रहे हैं,
जनाब अखबार पढ़िये,
लोग क्या-क्या कह रहे हैं।
गूगल कीजिये हमारा नाम,
आपको पता चलेगा हमारा काम,
और आपको पता चलेगा,
कि हम हवा में नहीं छोड़ते।
हम हवा में छोड़ते नहीं हैं,
हम हवा में दागते हैं,
क्योंकि...हम तोप हैं। 

Wednesday, June 13, 2012

आल इज़ वैल।


समझ, आपकी झोल में हैं,
परिस्थितियाँ कंट्रोल में हैं,
आल ईज़ वैल।

नेता जी, नेता थोड़ी हैं,
फिल्मी अभिनेता थोड़ी हैं,
लंदन से पढ़कर आये हैं,
कितना कुछ कर कर आये हैं,
आपका क्या है, आप तो जनता,
उमर अठ्ठारह, वोट है बनता।
पता भी है, इन्फ्लेशन क्या है,
सप्लाई-डिमांड का रिलेशन क्या है।
काले धन में काला क्या है,
मंदी में भला निराला क्या है।
नेता जी अपने अर्थशास्त्री,
और अर्थ क्या
, वो तो तर्कशास्त्री,
तर्क करो, तब तो जानें,
ऐसे ही कुछ भी क्यों मानें,
नेता जी का तर्क बाण है,
समझ, आपकी झोल में है,
परिस्थितियाँ कंट्रोल में हैं,
आल इज़ वैल।

नेता जी ने खुद नापा है,
डेली का खर्चा आँका है,
चार रुपये में चाय कटिंग दो,
बीस रूपये के भात गटक लो,
चार रूपये में आना-जाना,
बत्तीस में बस दिन कट जाना।
महँगा है क्या, ज़रा बताना।
समझ, आपकी झोल में है,
परिस्थितियाँ कंट्रोल में हैं,
आल इज़ वैल।

खाना, बिजली, तेल या चारा,
सप्लाई डिमांड का खेल है सारा,
खपत बढ़ी तो मँहगा होगा,
कन्ज्यूमर ही को सहना होगा।
सरकार में तो सब कमिटिड हैं
वांट्स आपके अनलिमिटेड हैं।
समझ, आपकी झोल में है,
परिस्थितियाँ कंट्रोल में हैं,
आल इज़ वैल।

बिज़निस की तो यही कहानी,
मंदी पीछे तेज़ी आनी।
विश्व ही पूरा झूझ रहा है,
भारत तो महफूज़ रहा है।
देखो जरा ग्रीस की हालत,
बख्शो अपनी समझ पे लानत,
समझ आपकी झोल में है,
परिस्थितियां कंट्रोल में हैं।
आल इज़ वैल।

नेताजी योगा करते हैं,
पौज़ीटिवली सोचा करते हैं,
रोते नहीं रिसेशन-रिसेशन,
आज नहीं तो अगला सेशन।
सोच की अपनी डोज़ बढ़ाओ,
कुछ भी बस मत सुनते जाओ।

समझ, आपकी झोल में है,
परिस्थितियाँ कंट्रोल में हैं,
आल इज़ वैल।

Thursday, May 24, 2012

राजा का चुनाव है।

जंगल पूरा व्यस्त है,
जंतु हर पस्त है।
आव है ना ताव है,
राजा का चुनाव है।
राजा जिसपे गर्व हो,
राम-राज्य सर्व हो।

राजा कोई शेर हो,
गर कोई अंधेर हो,
राजा लड़ तो जायेगा,
जंगल को बचायेगा।

पर राजा शेर जो,
सनका किसी बेर जो,
सबको खा जायेगा,
कौन रोक पायेगा। 

राजा कोई चीता हो,
माईनोरिटी से जीता हो,
ताकत भी है तेज भी,
सेक्यूलर इमेज भी।

चीता पर जीता गर,
जायेगा फजीता बढ़,
माईनोरिटी जो जीतेगी,
मेजोरिटी छाती पीटेगी।

राजा कोई बकरी हो,
सालों से जो जकड़ी हो,
शोषित है, कमजोर भी,
पिछड़ों की सिरमौर भी।

पर राजा, बकरी प्यारी हो,
और हाथी की सवारी हो,
लुक नहीं आयेगा,
हाथी भाग जायेगा।

राजा कोई गधा हो,
बोझ तले लदा हो,
श्रमिक का उत्थान हो,
सम्यता का गान हो।

गधा पर जो राजा बन,
तोड़े गद्दी बन ठन,
बोझा कौन ढोयेगा,
जंगल पूरा रोयेगा। 

राजा हो बस नाम का,
नहीं किसी भी काम का,
कुरसी पर सजा करे,
खाये और मजा करे।

राजा जिसपे गर्व हो,
राम-राज्य सर्व हो।
जंगल जाये भाड़ में,
आग लगे झाड़ में,
आव है ना ताव है,
राजा का चुनाव है।

Sunday, March 25, 2012

कलम-क्रांति।

मैं लिखता हूँ,
तुम पढ़ो,
और कुछ करो।

प्रेरणा...???
प्रेरणा की तुम फिकर मत करो,
मैं लिख तो रहा हूँ।
तुम पढ़ो,
और आगे बढ़ो।

तुममें अथाह शक्ति है,
तुम हनुमान हो,
पर कर क्या सकते हो,
तुम इस बात से ही अनजान हो।
मैं तुम्हारी खातिर जाम्वंत बनूँगा,
मैं लिखूँगा,
ताकि तुम पढ़ो,
और आगे बढ़ो।

तुम्हें इल्म है...???
क्या ख्वाब है,
क्या हकीकत है ?
तुम्हें खयाल है...???
समाज को तुम्हारी,
कितनी जरूरत है।
मैं तुम्हें बताऊँगा।
मेरी कवितायें पढ़ो,
मेरी कहानियाँ समझो,
और मेरे नाटक देखो,
तुम्हें गलत का ज्ञान होगा,
सही का, पहचान होगा।
तुम्हें एहसास होगा,
कि देश जल रहा है,
और तुम्हारा पौरूष...
ड्रॉइंग रूम में बैठा,
हाथ मल रहा है।
खड़े हो जाओ,
तलवार उठा लो,
दुनिया बदल डालो।
और प्रेरणा की तुम फिकर मत करो,
मैं लिख तो रहा हूँ,
तुम पढ़ो,
और आगे बढ़ो।

इतिहास गवाह है,
जब-जब किसी ने कलम उठाई है,
क्रांति आई है।
रामायण देख लो,
वाल्मीकी जी ने कही,
रामचंद्र जी ने लंका ढही।
महाभारत,
व्यास ने रची,
तब जाके मची।
और भारत...,
भारत जो आज आज़ाद है,
किसी की कलम का ही तो हाथ है।
कृष्ण जी ने गीता गढ़ी,
गाँधी जी ने पढ़ी,
इधर गाँधी जी इंस्पायर हुये,
उधर अंग्रेज देश से बाहर हुये।
मैं भी तुम्हें इंस्पिरेशन दूँगा,
मैं लिखूँगा,
तुम पढ़ो,
और आगे बढ़ो।

यही तो क्रांति की रीति है,
लिखने वाले लिखें,
लड़ने वाले पढ़ें,
और पढ़ने वाले लड़ें।
कलम मैंने उठा ली है,
तलवार तुम उठा लो,
और दुनिया बदल डालो,
और क्रांति,
क्रांति तो बस अब आई समझो,
मैं लिख तो रहा हूँ,
तुम बस पढ़ो,
आगे बढ़ो,
लड़ो,
और कुछ करो।

Thursday, January 26, 2012

मैं लड़ता रहुँगा।

बादलों का आगे, धुंधलके में छिपकर,
जो दिखती नहीं है, वो मंजिल है मेरी।
मुंबई की लोकल की भीड़ में पिसकर भी,
पिसती नहीं जो वो चाहत है मेरी।

मंजिल की मुझसे दूरी ना देखो,
पैदल हूँ, ये भी मजबूरी ना देखो।
इस जिस्म की डेढ़ पसली ना देखो,
चप्पल की घिसती तली भी ना देखो।

ना परखो, मेरे हुनर की भी नोकें,
ना ताको, हवाओं के रुख के भी झोंके,
उम्र का भी मेरी, गणित ना लगाना,
अपने तजुर्बे पर भी ना जाना..।

पा लूँगा मंजिल, कोई कारण नहीं है,
इतिहास में भी उदाहरण नहीं है।
इतिहास भी पर भविष्य ही जब था,
वो भी कहाँ कम, असंभव से कब था।

हर कसौटी की तुम्हारी हदें तोड़ दूँगा,
परे मैं, वो सारी, वजह छोड़ दूँगा।
जो रोकेंगी मुझको, मेरे रास्ते से,
जो टोकेंगी मुझको, मेरे रास्ते में।

जीतूँगा मैं ही ये लिख लो अभी से,
खिला दूँगा कलियाँ, मैं कली मरुजमीं से।
मुझे बस यकीं है, चाहत पे मेरी,
मैं लड़ता रहूँगा, कितनी हो देरी।
मैं लड़ता रहूँगा, कितनी हो देरी।

Tuesday, November 22, 2011

मुंबई के मेंढक।

मेंढकों में होड़ हो गई,
कि मुंबई किसके बाप की है।
दोमुहेँ केंचुओं ने अपने-अपने मेंढक चुने,
और बोले,
हुजूर आपकी है।
हुजूर आपकी है।

फैसला फिर अटक गया।
मुंबई का बाप पता चलते-चलते,
बीच में ही लटक गया।
मेंडकों का दिमाग सटक गया।

मक्खियाँ भिनभिनाईं
कि हुजूर
इंसानों में जब भी,
इस तरह का विवाद हुआ है,
बापों का फैसला,
माँओं से पूछने के बाद हुआ है।

ततैये तमतमा उठे,
और उड़-उड़कर झाँकते हुए बोले,
कि हुजूर...
इंसानों को तो हम बड़ा पीछे छोड़ आये हैं
उतना पीछे जाने में,
और माँ का पता लगाने में,
तो बड़ा वक्त बीत जायेगा,
तब तक तो कोई और रेस जीत जायेगा।

इस पर,
घोंघे ने हिलने का कष्ट किया,
और अपना पक्ष स्पष्ट किया,
हुजूर....
हुकुम करें,
घोंघे पूरा मुंबई रोक देंगे,
कोई हिला, वहीँ ठोक देंगे।

बात मेंढकों के जम गई,
मुंबई घोंघे की तरह, थम गई,
मेंढक फुदक-फुदक कर टरटराये,
मुंबई किसके बाप की है।
मुंबई किसके बाप की है
दोमुहेँ केंचुओं ने अपने-अपने मेंढक चुने,
और बोले,
हुजूर आपकी है।
हुजूर आपकी है।

Monday, November 14, 2011

समझौता।

हमारा समझौता हो गया है,
ना मैं उसकी तारीफ करता हूँ,
ना वो मेरी।
किसी ने किसी से कुछ नहीं कहा।
बिन कहे ही हम समझ गये कि,
हमारा समझौता हो गया है।

पहले उसने लिखना शुरू किया था,
और मैंने तारीफ करना।
फिर उसकी देखा-देखी,
मैंने लिखना शुरू कर दिया,
और मेरी देखा-देखी,
उसने तारीफ करना।

हम दोनों अच्छा लिखते थे।
फिर एक दिन मुझे लगा,
कि मैं ज्यादा अच्छा लिखता हूँ,
और उसे लगा वो।
उसे लगा,
वो ज्यादा तारीफ का हकदार है,
और मुझे लगा मैं।

बस उसी दिन से,
हमारा समझौता हो गया है,
ना मैं उसकी तारीफ करता हूँ,
ना वो मेरी।

Monday, October 31, 2011

एक और मुनादी।

सुनो – सुनो – सुनो
सुनो – सुनो – सुनो
सर्वसाधारण को सूचित किया जाता है,
और प्रशासन की प्राथमिकताओं से,
परीचित किया जाता है
कि गरीबी हटा दी जायेगी,
जनसंख्या जल्द से जल्द घटा दी जायेगी,
बिजली-पानी की किल्लत दूर होगी,
भुखमरी खुद हमें छोड़ने को मजबूर होगी।
खेत-खलिहान खड़े होकर लहलहायेंगे,
और कऊए चिड़ियों की तरह चहचहायेंगे।

प्रशासन को हर्ष है,
कि अभी आजादी का मात्र पैंसठवा ही वर्ष है,
और प्रशासन की पचहत्तरवीं पंचवर्षीय योजना का,
पन्द्रहवाँ प्रारूप पहले ही तैयार है,
बस योजना परिषद के प्रधान पदाधिकारियों से,
प्रस्ताव पारित होने का इंतजार है।
परिकल्पना के परे के परीलोक का वो प्यारा सपना,
अब पूरा होने वाला है
जिसमें जालसाज़ को जेल,
और सच्चे का बोलबाला है।

प्रशासन जानता है,
जनता ने इंतजार किया है।
प्रशासन मानता है,
भरोसा बार-बार किया है।
प्रशासन शुक्रगुज़ार है।
प्रशासन आश्वस्त करता है,
कि भले कितना भी लंबा समर होगा,
पर प्रजातंत्र का अपना सुंदर सपना,
एक दिन ज़रूर अमर होगा।

प्रशासन समझता है,
प्रजातंत्र में प्रतिरोध व प्रदर्शन,
बुनियादी हक है, ज़रूरी है,
परंतु प्रशासन की अपनी,
प्रशासनिक मजबूरी है।
फिर भी प्रशासन प्रजा को,
प्रतिरोध प्रदर्शन का हक प्रदान करता है,
किंतु कानून व्यवस्था की खातिर,
प्रदर्शकों को सावधान करता है,
कि प्रदर्शन के लिये कम-स-कम,
छः माह पूर्व परमिट लेना होगा।
और प्रार्थना-पत्र में प्रदर्शन के कारणो का लिखित ब्यौरा
संलग्न प्रमाण सहित देना होगा।
प्रशासन प्रार्थना-पत्र पर विचार करेगी,
उपयुक्त कारणों पर प्रदर्शन का आवेदन-पत्र
अवश्य स्वीकार करेगी।

प्रदर्शन में भूखे रहने पर सख्त मनाही होगी,
जलसों और जुलूसों पर कानूनन कार्यवाही होगी,
मशालों के प्रयोग पर पर्यावरण विभाग की पाबंदी होगी,
महज़ महकने वाली मोमबत्तियों पर प्रशासन की रज़ामंदी होगी।
प्रशासनिक क्षेत्र की प्रशासनिक सीमा में,
पाँच से अधिक प्रदर्शकों का समूह नहीं बना सकते हैं।
पारित पद्धति के अंतर्गत,
प्रदर्शनकारी सिर्फ तालियाँ बजा सकते हैं।
ध्यान रहे, ध्वनि तरंगो का माप पचास डैसीबेल से कम होना चाहिये,
प्रदर्शन पौने आठ बजे शुरू होकर पौने नौ से पहले खतम होना चाहिये।
प्रशासनिक पदाधिकारी भी इंसान है, नौ बजे के पश्चात वो सोता है,
शोर-शराबे से, उसके पारीवारिक जीवन में खलल होता है।
यदि प्रदर्शन इसके बाद, एक पल भी चलाया जायेगा,
तो प्रायोजकों पर, पाँच सौ रूपये प्रति पल प्रति प्रदर्शनकारी चार्ज लगाया जायेगा।

प्रशासन चाहता है,
कि प्रदर्शन में समाज के सभी वर्गों की भागीदारी हो,
प्रदर्शकों में पन्द्रह प्रतिशत अनुसूचित जाती, साढ़े सात जनजाती,
सत्त्ताईस में अन्य पिछड़े और तैंतीस प्रतिशत में अबला नारी हो।
इसके अतिरिक्त प्रस्तावित प्रतिरोध प्रदर्शन में,
प्रत्येक सम्प्रदाय का प्रतिनिधित्व होना चाहिये,
क्योंकि एक धर्मनिर्पेक्ष शासन प्रणाली में,
प्रदर्शन भी तो धर्मनिर्पेक्ष होना चाहिये।
प्रदर्शन के लिये प्रस्तावित पुलिस सुरक्षा का,
पूरा खर्चा प्रदर्शकों को खुद सहन करना होगा।
यदि शाँती व्यवस्था बिगड़ी,
तो पाँच लाख रूपये का अतिरिक्त आर्थिक दंड वहन करना होगा।
प्रदर्शन से प्राप्त आमदनी और खर्चे की कर-अधिकारियों द्वारा जाँच होगी,
उद्घाटित प्रायोजकों के व्यक्तिगत मामलों पर सार्वजनिक रूप से पूछताछ होगी।
यदि प्रायोजकों की छवि पूरी तरह से क्लीन होगी,
केवल तभी प्रदर्शन के लिये प्रशासन की सिग्नल ग्रीन होगी चाहिये।

प्रदर्शन कब, कहाँ और कैसे करना है,
ये प्रशासन बतायेगा,
तय राशी के अदायगी पर,
प्रदर्शन के लिये प्रमुख सुविधायें भी,
प्रशासन मुहैय्या करायेगा।
किंतु प्रदर्शन में प्रशासन के विरूद्ध,
कोई नारा नहीं होगा।
प्रशासनिक पदाधिकारी की कार्यप्रणाली पर भी प्रश्न,
गवारा नहीं होगा।

प्रशासन जानता है,
जनता साथ देगी,
प्रशासन के हाथ में,
हमेशा की तरह अपना हाथ देगी।
प्रशासन जनता की,
समस्त समस्याओं के समाधान हेतु तत्पर है,
और कुछ को तो बिल्कुल,
सुलझा देने की हद पर है।
प्रशासन का... अपना एक संविधान है,
जिसमें... प्रत्येक प्रश्न को सुलझाने का प्रावधान है।
परंतु.. प्रशासनिक प्रणाली में,
कुछ वक्त लगता है।
और इसीलिये प्रशासन जनता से,
ये उम्मीद रखता है,
प्रशासनिक मामलों में,
जनता सब्र करे।
और कुछ नहीं तो प्रशासन की प्रतिबद्धता,
पर ही फक्र करे।

प्रशासन, पहले से धन्यवाद प्रेषित करता है।
और मुनादी का अनुपालन अपेक्षित करता है।
आज्ञा से-
प्रशासन,
प्रजा की सेवा में तत्पर।

Thursday, September 8, 2011

एक्शन रीप्ले।

कुत्ते भौंकते रहे,
गधे रेंकते रहे,
हम घरों में बैठकर,
हाथ सेंकते रहे।

बम कहीं कोई फट गया,
घर कहीं कुछ ढह गये,
तमाशाई बस खड़े,
देखते ही रह गये।

कुछ तो बस घायल हुये,
कुछ वहीँ पे मर गये,
करने वाले आये भी,
और काम अपना कर गये।

पुलिस की आहट हुई,
ज़िंदे सारे डर गये,
मुर्दे और करते भी क्या,
वहीँ पर पसर गये।

लाशें सब छाँटी गईं,
शिनाख्त हुई, बाँटी गईं।
ज़िंदे खुद होकर खड़े,
पैबंद टाँक, चल पड़े।

लोगों ने हिसाब कर,
ज़िंदे अपने गिन लिये,
जिनके जो भी मर गये,
कीमत लगा निकल लिये।

हलक की तोपें चलीं
उंगलियाँ भी तन गईं,
हर तरफ हरकत हुईं,
कमैटियाँ कुछ बन गईं।

कानफाड़ू शोर से,
शाँती के वादे हुये,
घोषणायें अनगिनत,
पर सब के सब आधे हुये।

किसी ने कविता कही,
कुछ बहस कर चल दिये,
दो-चार की कर धर-पकड़,
पुलिस ने हाथ मल दिये।

चीख कर बैठे गले,
फिर खड़े जब हो गये,
रीप्ले का बटन दबा,
रिवाइन्ड सारे हो गये।

बम कहीं कोई फिर फटा,
घर कहीं फिर ढह गये,
तमाशाई अब भी बस,
देखते ही रह गये।

कुत्ते भौंकते रहे,
गधे रेंकते रहे,
हम घरों में बैठकर,
हाथ सेंकते रहे।

Tuesday, August 16, 2011

भूख-हड़ताल।

भूख-हड़ताल पर बैठा एक व्यक्ति जब भूख से मर गया,
और सीना ठोककर, अपना जीवन देश के नाम कर गया,
तो इसकी सूचना.......
जब सूचना मंत्रालय के बहरे कानों तक पहुँच गई,
और गृह-मंत्रालय में भी गृहयुद्ध की आशंका मच गई,
तब मौन-मगन प्रधानमंत्री ने अंततः अपनी चुप्पी तोड़ी,
और भूखे व्यक्ति की भूख पर जाँच कमैटी बना छोड़ी।

मरने वाले ने क्यों-कर भूख-हड़ताल की,
जाँच कमैटी ने इसकी पूरी पड़ताल की,
कान में ऊन डालकर, कानून चोदा गया,
मरने वाले का पूरा पास्ट खोदा गया,
दो-चार महीनों में जब फाईल, अच्छी-खासी भारी हो गई,
तो जाँच कमैटी की रिपोर्ट जारी हो गई।

ये सच है कि
भूख से संबद्ध व्यक्ति का स्वास्थ्य बिगड़ गया था,
और पोषण के अभाव में वह मृत्यु की भेंट चढ़ गया था,
किंतु ये सरासर बकवास है,
कि भूख का कारण, देश की खातिर उपवास है।
मरने वाला तो वैसे भी भूखा था,
क्योंकि देश में तो दस साल से सूखा था।
वो तो चाहकर भी क्या ही खाता,
आज नहीं तो कल तो मर ही जाता।
वो जानता था कि दो चार दिनों जीवन यूँही छूट रहा था,
तभी तो मौका ताड़, देशभक्ति का माईलेज लूट रहा था।

हमारी हिदायत है कि
ऐसे मौका-परस्त इंसान पर कानूनन कार्यवाही की जाये,
और मरे हुये व्यक्ति को मरणोपरांत सख्त से सख्त सजा दी जाये,
ताकि फिर कोई भूखा ऐसे काम को अंजाम ना दे,
अपनी संवैधानिक मृत्यु को असंवैधानिक हड़ताल का नाम ना दे।

जनता जान ले कि देश का कानून भूखों के साथ है,
क्योंकि पूरा का पूरा प्रशासन ही भूखों के हाथ है।
हम भी तो भूखे हैं, कब से इस देश को खा रहे हैं,
फिर भी तो इसे ठीक ही ठाक चला रहे हैं,
गर आप अभी से हिम्मत हार जायेंगे,
तो गाँधी-सुभाष के इस देश को भूखा ही मार जायेंगे।

हमारी मानिये,
खुद भी खाईये और हमें भी खाने दीजिये,
सबका पेट भर जाने दीजिये,
क्योंकि जिस रोज सबका पेट भर जायेगा,
भ्रष्टाचार का भूत तो अपने आप ही मर जायेगा।

Tuesday, June 21, 2011

आज मैं कवि हो गया हूँ।

यूँ कवितायें तो मैं जाने कब से लिखता था,
और लगभग हर कोण से, कवि-कवि ही दिखता था,
पर पिछले हफ्ते,
जब कवियों की तरह मुझे बुलाया गया,
और कवियों के बीच बिठाया गया,
तब मुझे विश्वास हो गया,
कि निश्चय ही, कवि मैं आज हो गया।

पहली दफ़ा, मैंने कवित्व को महसूस किया,
और पहली दफ़ा ही कवित्व को महफूज़ किया।
पहली दफ़ा, कवियों की तरह, कवियों को देखा,
कवियों ही तरह, कवियों को सुना।
बीच-बीच में दाद दी, वाह-वाह की आवाज दी,
ना कम की, ना ज्यादती किसी के साथ की,
हर कवि की तारीफ बराबरी के साथ की।
कवियों की तरह मैंने धीरता से इंतजार किया,
और मौका मिलते ही कविताओं का वार किया।
कवियों की तरह, मैंने कविता सुनाई,
किसी की समझ में आई, आई,
नहीं आई, नहीं आई।
पर कवियों की तरह, मैंने सबसे ताली बजवाई।

और इस तरह, अपनी सुना-सुनू कर,
कवियों की तरह जब मैं जाने लगा,
और अपना मेहनताना उठाने लगा,
तो हाल ही में हासिल मेरे कवित्व को टोककर बोली,
मेरी कविता मुझे रोककर बोली,
कि कविवर,
मामला आज कुछ जमा नहीं,
शब्दों में भाव भी रमा नहीं,
माफ करना यूं लगा,
की पत्ती तो शायद ठीक ही थी,
पर चाय कहीँ पर फीकी थी।

मैंने कविता को बीच में ही काट दिया
और कवि होने के नाते, हकपूर्वक डाट दिया,
कि मामला नहीं भी जमता तो ना जमे,
और भाव ग़र नहीं भी रमता तो ना रमे,
ये जो इतनी भीड़ खड़ी है,
यहाँ भाव की, किसे पड़ी है।
कल तक जब कवितायें मैं लिखता था,
और कहीँ-कहीँ से कवि-कवि सा दिखता था,
तब कविता, ये तुझको सुनने आते थे,
गिनकर, पूरे पाँच कहाँ हो पाते थे।
देख आज ये मुझको सुनने आते हैं,
कुछ भी कह दूँ, ये तालियाँ बजाते हैं।
क्यों कि आज मैं,
सम्मानित, प्रमाणित,
सिद्ध, प्रसिद्ध,
सत्यापित, प्रचारित,
ये सभी हो गया हूँ।
कल तक बस मैं लिखता था,
पर आज मैं कवि हो गया हूँ।

Monday, April 25, 2011

ये साले... सपने!

काश....., ये सपने ना होते,
या फिर…., ये साले अपने ना होते..।
चलो होते ..., तो इतने, बड़े ना होते,
हरदम,... सर पर चढ़े ना होते।

अब देखो...,
अच्छी खासी नौकरी है,
बढ़िया से बीत रही है,
खूब कमा रहा हूँ,
पी रहा हूँ, खा रहा हूँ,
पैसे भी बचा रहा हूँ,
फिर भी ....
एक ही बात मना रहा हूँ,
कि काश..., ये सपने ना होते,
या फिर..., ये साले अपने ना होते।

ये साले ...सपनें...
रातों को डेढ़ बजे आते हैं,
साढ़े तीन बजे फिर चक्कर लगाते हैं,
और सुबह पाँच बजे,
तो कान में ऐसी फुरफुरी मचाते हैं,
कि मैं कहता हूँ
भैय्या सोने दे,
मैं भी इंसान ही हूँ,
थोड़ी देर तो चैन होने दे।
कहतें हैं, कि बस हो गया,
चद्दर तानी सो गया।
सपने इतने बड़े-बड़े,
पूरे होंगे पड़े-पड़े।

सालों की...हिम्मत देखो,
मेरे सपने..., मेरे सपने में आके, मुझे...,
मेरा ही सपना बता रहे हैं,
मैं नींद में हूँ इसलिये जिंदा हैं,
और मुझे ही उठा रहे हैं।

एक दिन मैं भी आपे से बाहर हो गया,
मैंने दिमाग के हर दरवाजे पे ताले लगा दिये,
और आने-जाने वाले रस्ते पे रखवाले लगा दिये,
कि हर खयाल का नाम पूछना,
क्यों आया है, काम पूछना,
और लौटेगा कैसे, इंतजाम पूछना।
पर क्या ताले,
और क्या रखवाले,
ये साले.... सपने,
चोर नहीं है,....डाकू हैं,
सबके हाथ में बड़े-बड़े चाकू हैं,
सालों ने पूरे दिमाग को हाईजैक कर लिया,
और दिमाग के हर उस हिस्से को हैक कर लिया,
जो मेरे हिसाब से ठीक था,
दुनिया के हिसाब से भी सटीक था,
और अब देखो,
अच्छी खासी नौकरी है, बढ़िया से बीत रही है,
खूब कमा रहा हूँ, पी रहा हूँ, खा रहा हूँ,
फिर भी ये सपने, बड़े-बड़े सपने दिखाते हैं,
और ऐसी-ऐसी चीज करवाते हैं,
कि सब हमें देखके एक ही चीज फरमाते हैं,
कि काश ये सपने ना होते,
या फिर.... ये साले अपने ना होते।

Monday, January 31, 2011

ये शहर।

ये शहर रोता नहीं है,
ये शहर हँसता नहीं।
ये कभी सोता नहीं है,
ये कभी जगता नहीं।

ये शहर छोटा नहीं है,
पूरा भी पर पड़ता नहीं।
कोई यहाँ तन्हा नहीं है,
और साथ भी चलता नहीं।

ये शहर जीता नहीं है,
ये शहर मरता नहीं।
ये जगह कोई शहर ही है,
या ये कोई शहर ही नहीं?