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Wednesday, April 23, 2014

मेरे माथे पर छपा एक विज्ञापन।

इस शख्स का नाम विनीत,
उम्र तीस,
रंग गेहुँआ,
कद दरम्याना,
चेहरा गोल
है,
बाँयी पलक पर
,
चोट का निशान,
असमय बाल झड़ने से,
सर पर बना खाली स्थान,
और बदन बेडोल है।
शक्ल से बेतरतीब,
और बेवजह बद्तमीज़,
लगने वाला ये शख्स,
पिछले कई... हफ्तों से,
हकीकत से लापता है।
और अभी इसकी गुमशुदाई का,
इसे खुद भी कहाँ पता है।
आखिऱी बार इसे,
ख़यालों के मुहाने पर पाया गया था,
और उस रोज़ भी,
इसे समझाया गया था,
पर ये ठहरा बेवकूफ, अड़ गया,
फिज़ूल चक्करों में पड़ गया,
और पल-पुसकर जब किसी काम लायक ये हो गया,
उसके बाद ये खो गया।

इसे ढूँढने वाले का ये इनाम है,
कि इसे ढूँढने वाले को, ये इनाम है।
इसे ढूँढें,
और सबसे पहले,
तो इसे, इसके खोने की इक्तला दें,
फिर हक से,
हर मुद्दे पर इसे सलाह दें।
इससे इसके बारे में,
जो मर्जी व्यक्तिगत सवाल पूछें,
इसे सार्वजनिक संपत्ति समझें,
और बेझिझक पूरा इतिहास पूछें।

इसकी संपत्ति का ब्यौरा लें,
इसकी आमदनी का हिसाब लगायें,
इसके खर्चे जोड़ें,
फिर इसे छोड़ें,
और बाकी सबसे इसके बारे में मशवरा करें,
पंचायत जमा लें,
और मिलज़ुल कर इस पर फैसला करें।
इसे अपना समझें,
और अपनी समझायें,
और इसकी किसी बात में ना आयें।
इसकी पढ़ाई-लिखाई सब नकार दें,
इसकी सोच को दुत्कार दें,
ज़रूरत पड़े, तो दो चार थप्पड़ ही क्यों ना मार दें।
इसकी क्या ख़ता,
और इसे क्या पता,
इसे आपकी नसीहतों की कितनी सख़्त ज़रूरत है।
आप ऐवरेस्ट छूकर आये हैं,
चाँद पर आपका आना जाना है।
हर विषय पर आपने पी एच डी की है,
सर्व प्रकार से आप क्वालिफाईड हैं,
आपने दुनिया देखी है।
इसका क्या है,
जैसे तैसे तीस का हो गया,
और तीस का होते ही तो खो गया।
इसकी ज़िंदगी की बागडोर,
बस अब, आप अपने हाथ में ले लें,
और इससे पहले कि ये कुछ कर गुज़रे,
इसे भी अपने ही साथ में ले लें।
इतिहास गवाह है,
इतिहास, आपने बनाया है,
ज़िंदगी भर आपने इतिहास को,
और इतिहास ने आपको दोहराया है।
इसलिये, इसके जीवन को भी आप,
अपने जैसा ही खास कर दें,
इसे जहाँ कहीँ देखें,
इसे अपनी सलाह दें,
और इसे भी अपने जैसा ही इतिहास कर दें। 

Sunday, January 13, 2013

शोकथाम।


ढोल बज गया है।
मंच सज गया है।
माईक में चिल्ला कर दखो,
स्टेज पूरा हिला कर देखो,
अभी-अभी बस पता चला है,
बलात्कार पर शोक सभा है।

दिल्ली में एक रेप हुआ है,
महिला पर आक्षेप हुआ है,
बलात्कारी तो भाग गया है,
लेकिन, देश तो जाग गया है।
इसीलिये तो शोकसभा है,
अभी-अभी तो पता चला है।

चारों ओर कोहराम मचा है,
कोना कोई कहाँ बचा है,
ऐसा हस्तक्षेप हुआ है,
देश में पहला रेप हुआ है,
इसीलिये तो शोकसभा है,
अभी-अभी तो पता चला है।

मुनियों, गुणियों, ज्ञान का भारत,
माता सम सम्मान का भारत,
वो भारत जो जगत-गुरू है,
हाय.. वहाँ भी रेप शुरू है,
इसीलिये तो शोकसभा है,
अभी-अभी तो पता चला है।

मंच पे अब तो चढ़ना ही होगा,
भाषण भी एक पढ़ना ही होगा,
चिल्लाना होगा चीत्कार,
बंद करो बस अत्याचार।
इसीलिये तो शोकसभा है,
अभी-अभी तो पता चला है।

पत्रकार भी बुलाने ही होंगे,
आँसू चार बहाने ही होंगे,
होगा थोड़ा सोच-विचार,
वादे भी तो होंगे चार,
इसीलिये तो शोकसभा है,
अभी-अभी तो पता चला है।

देश में पूरे एक ही मत है,
कुछ भी हो, पर रेप गलत है।
फूँको गाड़ी, तोड़ो कार,
रेपों को पर रोको यार,
इसीलिये तो शोकसभा है,
अभी-अभी तो पता चला है।

ज्ञानी, ध्यानी, नेता बेमानी,
बाबा, अम्मा, नाना-नानी,
सबका एक-एक,
साक्षात्कार।
इसीलिये तो शोकसभा है,
अभी-अभी तो पता चला है।

पहले भ्रष्टों पर शोक हुआ था,
फिर आतंकवाद का विरोध हुआ था,
और आज का मुद्दा,
बलात्कार।
इसीलिये तो शोकसभा है,
अभी-अभी तो पता चला है।

Friday, July 6, 2012

हम तोप हैं।


हम कौन हैं।
हम.... कौन हैं।
हमें हमारी तारीफ करने के लिये कह रहे हैं,
बाद में
कहियेगा कि साब भावनाओं में बह रहे हैं।

हम तोप हैं।
हम..... तोप हैं..,
और तोप के गोले भी हम खुद ही हैं।
और हमें तोपची की जरूरत थोड़ी है,
हम तो खुद को खुद में भरकर,
खुद ही आग लगा देते हैं।
और दुनिया को बता देते हैं,
कि हम तोप हैं।

आपने कभी हाथी देखा है,
हाथी...,
हाथी चलता है,
कुत्ते भौंकते हैं,
पर हम हाथी थोड़ी हैं,
हम तो तोप हैं,
हम तो खुद चलते हैं,
और खुद भौंकते हैं,
कि हम तोप हैं।

हम कोई ऐसी वैसी तोप थोड़ी हैं,
ना...
,
हम चलते हैं,
और हमेशा निशाने पे लगते हैं,
हमारे निशाने अचूक हैं,
और हमारी हर जीत के
,
हम खुद ही एक सबूत हैं,
हमें दुनिया के सर्टीफिकेट की जरूरत थोड़ी है,
ना.....
दुनिया क्या जाने तोप,
क्या तोप का गोला..
.
दुनिया तो ना तोप..,
ना तोप का गोला...।
हम तोप हैं।

हम कहें कि हम चले,
तो हम चले...।
हम कहें कि हम लगे,
तो हम लगे...।
और आपको ना लगे,
तो ना लगे,
हमें कोई अफ्सोस नहीं,
क्यों कि हमें पता है,
इसमें हमारा कोई दोष नहीं।
हम तो श्रेष्ठ हैं,
और श्रेष्ठ क्या,
अलमोस्ट सर्वश्रेष्ठ हैं।


हमारी सफलता से,
दुनिया ओत-प्रोत है,
हमारा व्यक्तित्व,
प्रेरणा का जीता जागता स्रोत है,
और आप कहते हैं,
कि हम भावनाओं मे बह रहे हैं,
जनाब अखबार पढ़िये,
लोग क्या-क्या कह रहे हैं।
गूगल कीजिये हमारा नाम,
आपको पता चलेगा हमारा काम,
और आपको पता चलेगा,
कि हम हवा में नहीं छोड़ते।
हम हवा में छोड़ते नहीं हैं,
हम हवा में दागते हैं,
क्योंकि...हम तोप हैं। 

Wednesday, June 13, 2012

आल इज़ वैल।


समझ, आपकी झोल में हैं,
परिस्थितियाँ कंट्रोल में हैं,
आल ईज़ वैल।

नेता जी, नेता थोड़ी हैं,
फिल्मी अभिनेता थोड़ी हैं,
लंदन से पढ़कर आये हैं,
कितना कुछ कर कर आये हैं,
आपका क्या है, आप तो जनता,
उमर अठ्ठारह, वोट है बनता।
पता भी है, इन्फ्लेशन क्या है,
सप्लाई-डिमांड का रिलेशन क्या है।
काले धन में काला क्या है,
मंदी में भला निराला क्या है।
नेता जी अपने अर्थशास्त्री,
और अर्थ क्या
, वो तो तर्कशास्त्री,
तर्क करो, तब तो जानें,
ऐसे ही कुछ भी क्यों मानें,
नेता जी का तर्क बाण है,
समझ, आपकी झोल में है,
परिस्थितियाँ कंट्रोल में हैं,
आल इज़ वैल।

नेता जी ने खुद नापा है,
डेली का खर्चा आँका है,
चार रुपये में चाय कटिंग दो,
बीस रूपये के भात गटक लो,
चार रूपये में आना-जाना,
बत्तीस में बस दिन कट जाना।
महँगा है क्या, ज़रा बताना।
समझ, आपकी झोल में है,
परिस्थितियाँ कंट्रोल में हैं,
आल इज़ वैल।

खाना, बिजली, तेल या चारा,
सप्लाई डिमांड का खेल है सारा,
खपत बढ़ी तो मँहगा होगा,
कन्ज्यूमर ही को सहना होगा।
सरकार में तो सब कमिटिड हैं
वांट्स आपके अनलिमिटेड हैं।
समझ, आपकी झोल में है,
परिस्थितियाँ कंट्रोल में हैं,
आल इज़ वैल।

बिज़निस की तो यही कहानी,
मंदी पीछे तेज़ी आनी।
विश्व ही पूरा झूझ रहा है,
भारत तो महफूज़ रहा है।
देखो जरा ग्रीस की हालत,
बख्शो अपनी समझ पे लानत,
समझ आपकी झोल में है,
परिस्थितियां कंट्रोल में हैं।
आल इज़ वैल।

नेताजी योगा करते हैं,
पौज़ीटिवली सोचा करते हैं,
रोते नहीं रिसेशन-रिसेशन,
आज नहीं तो अगला सेशन।
सोच की अपनी डोज़ बढ़ाओ,
कुछ भी बस मत सुनते जाओ।

समझ, आपकी झोल में है,
परिस्थितियाँ कंट्रोल में हैं,
आल इज़ वैल।

Thursday, May 24, 2012

राजा का चुनाव है।

जंगल पूरा व्यस्त है,
जंतु हर पस्त है।
आव है ना ताव है,
राजा का चुनाव है।
राजा जिसपे गर्व हो,
राम-राज्य सर्व हो।

राजा कोई शेर हो,
गर कोई अंधेर हो,
राजा लड़ तो जायेगा,
जंगल को बचायेगा।

पर राजा शेर जो,
सनका किसी बेर जो,
सबको खा जायेगा,
कौन रोक पायेगा। 

राजा कोई चीता हो,
माईनोरिटी से जीता हो,
ताकत भी है तेज भी,
सेक्यूलर इमेज भी।

चीता पर जीता गर,
जायेगा फजीता बढ़,
माईनोरिटी जो जीतेगी,
मेजोरिटी छाती पीटेगी।

राजा कोई बकरी हो,
सालों से जो जकड़ी हो,
शोषित है, कमजोर भी,
पिछड़ों की सिरमौर भी।

पर राजा, बकरी प्यारी हो,
और हाथी की सवारी हो,
लुक नहीं आयेगा,
हाथी भाग जायेगा।

राजा कोई गधा हो,
बोझ तले लदा हो,
श्रमिक का उत्थान हो,
सम्यता का गान हो।

गधा पर जो राजा बन,
तोड़े गद्दी बन ठन,
बोझा कौन ढोयेगा,
जंगल पूरा रोयेगा। 

राजा हो बस नाम का,
नहीं किसी भी काम का,
कुरसी पर सजा करे,
खाये और मजा करे।

राजा जिसपे गर्व हो,
राम-राज्य सर्व हो।
जंगल जाये भाड़ में,
आग लगे झाड़ में,
आव है ना ताव है,
राजा का चुनाव है।

Sunday, March 25, 2012

कलम-क्रांति।

मैं लिखता हूँ,
तुम पढ़ो,
और कुछ करो।

प्रेरणा...???
प्रेरणा की तुम फिकर मत करो,
मैं लिख तो रहा हूँ।
तुम पढ़ो,
और आगे बढ़ो।

तुममें अथाह शक्ति है,
तुम हनुमान हो,
पर कर क्या सकते हो,
तुम इस बात से ही अनजान हो।
मैं तुम्हारी खातिर जाम्वंत बनूँगा,
मैं लिखूँगा,
ताकि तुम पढ़ो,
और आगे बढ़ो।

तुम्हें इल्म है...???
क्या ख्वाब है,
क्या हकीकत है ?
तुम्हें खयाल है...???
समाज को तुम्हारी,
कितनी जरूरत है।
मैं तुम्हें बताऊँगा।
मेरी कवितायें पढ़ो,
मेरी कहानियाँ समझो,
और मेरे नाटक देखो,
तुम्हें गलत का ज्ञान होगा,
सही का, पहचान होगा।
तुम्हें एहसास होगा,
कि देश जल रहा है,
और तुम्हारा पौरूष...
ड्रॉइंग रूम में बैठा,
हाथ मल रहा है।
खड़े हो जाओ,
तलवार उठा लो,
दुनिया बदल डालो।
और प्रेरणा की तुम फिकर मत करो,
मैं लिख तो रहा हूँ,
तुम पढ़ो,
और आगे बढ़ो।

इतिहास गवाह है,
जब-जब किसी ने कलम उठाई है,
क्रांति आई है।
रामायण देख लो,
वाल्मीकी जी ने कही,
रामचंद्र जी ने लंका ढही।
महाभारत,
व्यास ने रची,
तब जाके मची।
और भारत...,
भारत जो आज आज़ाद है,
किसी की कलम का ही तो हाथ है।
कृष्ण जी ने गीता गढ़ी,
गाँधी जी ने पढ़ी,
इधर गाँधी जी इंस्पायर हुये,
उधर अंग्रेज देश से बाहर हुये।
मैं भी तुम्हें इंस्पिरेशन दूँगा,
मैं लिखूँगा,
तुम पढ़ो,
और आगे बढ़ो।

यही तो क्रांति की रीति है,
लिखने वाले लिखें,
लड़ने वाले पढ़ें,
और पढ़ने वाले लड़ें।
कलम मैंने उठा ली है,
तलवार तुम उठा लो,
और दुनिया बदल डालो,
और क्रांति,
क्रांति तो बस अब आई समझो,
मैं लिख तो रहा हूँ,
तुम बस पढ़ो,
आगे बढ़ो,
लड़ो,
और कुछ करो।

Tuesday, November 22, 2011

मुंबई के मेंढक।

मेंढकों में होड़ हो गई,
कि मुंबई किसके बाप की है।
दोमुहेँ केंचुओं ने अपने-अपने मेंढक चुने,
और बोले,
हुजूर आपकी है।
हुजूर आपकी है।

फैसला फिर अटक गया।
मुंबई का बाप पता चलते-चलते,
बीच में ही लटक गया।
मेंडकों का दिमाग सटक गया।

मक्खियाँ भिनभिनाईं
कि हुजूर
इंसानों में जब भी,
इस तरह का विवाद हुआ है,
बापों का फैसला,
माँओं से पूछने के बाद हुआ है।

ततैये तमतमा उठे,
और उड़-उड़कर झाँकते हुए बोले,
कि हुजूर...
इंसानों को तो हम बड़ा पीछे छोड़ आये हैं
उतना पीछे जाने में,
और माँ का पता लगाने में,
तो बड़ा वक्त बीत जायेगा,
तब तक तो कोई और रेस जीत जायेगा।

इस पर,
घोंघे ने हिलने का कष्ट किया,
और अपना पक्ष स्पष्ट किया,
हुजूर....
हुकुम करें,
घोंघे पूरा मुंबई रोक देंगे,
कोई हिला, वहीँ ठोक देंगे।

बात मेंढकों के जम गई,
मुंबई घोंघे की तरह, थम गई,
मेंढक फुदक-फुदक कर टरटराये,
मुंबई किसके बाप की है।
मुंबई किसके बाप की है
दोमुहेँ केंचुओं ने अपने-अपने मेंढक चुने,
और बोले,
हुजूर आपकी है।
हुजूर आपकी है।

Tuesday, August 16, 2011

भूख-हड़ताल।

भूख-हड़ताल पर बैठा एक व्यक्ति जब भूख से मर गया,
और सीना ठोककर, अपना जीवन देश के नाम कर गया,
तो इसकी सूचना.......
जब सूचना मंत्रालय के बहरे कानों तक पहुँच गई,
और गृह-मंत्रालय में भी गृहयुद्ध की आशंका मच गई,
तब मौन-मगन प्रधानमंत्री ने अंततः अपनी चुप्पी तोड़ी,
और भूखे व्यक्ति की भूख पर जाँच कमैटी बना छोड़ी।

मरने वाले ने क्यों-कर भूख-हड़ताल की,
जाँच कमैटी ने इसकी पूरी पड़ताल की,
कान में ऊन डालकर, कानून चोदा गया,
मरने वाले का पूरा पास्ट खोदा गया,
दो-चार महीनों में जब फाईल, अच्छी-खासी भारी हो गई,
तो जाँच कमैटी की रिपोर्ट जारी हो गई।

ये सच है कि
भूख से संबद्ध व्यक्ति का स्वास्थ्य बिगड़ गया था,
और पोषण के अभाव में वह मृत्यु की भेंट चढ़ गया था,
किंतु ये सरासर बकवास है,
कि भूख का कारण, देश की खातिर उपवास है।
मरने वाला तो वैसे भी भूखा था,
क्योंकि देश में तो दस साल से सूखा था।
वो तो चाहकर भी क्या ही खाता,
आज नहीं तो कल तो मर ही जाता।
वो जानता था कि दो चार दिनों जीवन यूँही छूट रहा था,
तभी तो मौका ताड़, देशभक्ति का माईलेज लूट रहा था।

हमारी हिदायत है कि
ऐसे मौका-परस्त इंसान पर कानूनन कार्यवाही की जाये,
और मरे हुये व्यक्ति को मरणोपरांत सख्त से सख्त सजा दी जाये,
ताकि फिर कोई भूखा ऐसे काम को अंजाम ना दे,
अपनी संवैधानिक मृत्यु को असंवैधानिक हड़ताल का नाम ना दे।

जनता जान ले कि देश का कानून भूखों के साथ है,
क्योंकि पूरा का पूरा प्रशासन ही भूखों के हाथ है।
हम भी तो भूखे हैं, कब से इस देश को खा रहे हैं,
फिर भी तो इसे ठीक ही ठाक चला रहे हैं,
गर आप अभी से हिम्मत हार जायेंगे,
तो गाँधी-सुभाष के इस देश को भूखा ही मार जायेंगे।

हमारी मानिये,
खुद भी खाईये और हमें भी खाने दीजिये,
सबका पेट भर जाने दीजिये,
क्योंकि जिस रोज सबका पेट भर जायेगा,
भ्रष्टाचार का भूत तो अपने आप ही मर जायेगा।

Tuesday, November 24, 2009

सचिन बनाम तेंदुल्कर

इन दिनों एक अलग किस्म की लड़ाई चालू है। सचिन बनाम तेंदुल्कर। कहते हैं कि कबीर के मरने के बाद, हिंदुओं और मुसलमानों ने बड़ी लड़ाई लड़ी। हिंदू उनके शरीर को जलाना चाहते थे और मुसलमान दफनाना। कुछ ऐसा ही आजकल सचिन तेदुंल्कर के साथ भी चल रहा है, फर्क सिर्फ इतना है कि लोग शायद भूल गये हैं कि सचिन तेदुंल्कर अभी भी जिंदा हैं।
इस बार मुद्दा ये है कि लोग साफ तौर पर जानना चाहते हैं कि सचिन, तेंदुल्कर हैं या तेंदुल्कर, सचिन ? कौन बनेगा करोड़पति का गेम चालू है और एक करोड़ रुपये के लिये आखिरी प्रश्न है कि सचिन तेंदुल्कर क्या हैं ?
ऑप्शन ए) सचिन।
ऑप्शन बी) तेदुंल्कर।
उत्तर में केवल यही दो ही ऑप्शन्स हैं और कम्प्यूटर पर बैठे सचिन तेदुंल्कर पूरी तन्मयता से सोच रहे हैं कि वो सचिन हैं या तेंदुल्कर। और वो क्या, आज तो हमारे पूरे देश के सामने अहम मुद्दा ही ये है तभी तो देश के सारे बड़े नेता, तमाम अखबार और छोटे बड़े न्यूज़ चैनल पर एक ही डिस्कशन चालू है कि सचिन – सचिन हें कि तेंदुल्कर- तेंदुल्कर ? और अनगिनत ट्रॉफी जीतने वाले सचिन तेंदुल्कर, खुद एक ट्रॉफी की तरह शोकेस में पड़े पड़े इंतजार कर रहे हैं इस राष्ट्रव्यापी फैसले का।
इस वाकया से हमें हमारी जवानी के दिनों के वो दिन याद पड़ते हैं जब दाढ़ी-मूँछों का रौंआ भर आया होगा और हमने मौहल्ले के सारे लौंडे-लपाटों को इकट्ठा कर के टोली बनाई और मौहल्ले की लड़कियों के माईबाप हो गये। मजाल क्या जो कोई हमारे मौहल्ले की लड़की को आँख उठाकर भी देख ले। हमारे मौहल्ले की लौंडिया है हम छेड़ेंगे और कोई क्यों छेड़े ? लड़कियों के स्वामित्व की इस लड़ाई में जाने कितने मर खप गये पर लड़कियों को तो कभी खबर भी न हुई। जैसे – जैसे दाढ़ी मूँछ का रौंआ घना हुआ, वो लड़ाई तो खत्म हो गयी, अब ये नयी लड़ाई शुरु हुई है। फिक्र इसी बात की है अब ये लड़ाई करने वाले रौंयेदार दाढ़ी-मूँछ के लौंडे नहीं हैं, बल्कि पकी पकाई दाढ़ी-मूँछ वाले आदमी हैं। भगवान जाने ये लड़ाई कब खत्म होगी ?

Monday, July 20, 2009

विद्वानों के बीच मतभेद है।

विद्वानों के बीच मतभेद है की विद्वानों के बीच मतभेद क्यों है। अरे भई ये भी कोई बात हुई, विद्वान हैं इसलिये मतभैद हैं, मूर्ख तो हैं नहीं जो किसी भी बात पर आव देखें ना ताव और सहमत हो जायें। दरअसल विद्वान व्यक्ति की तो विद्वता ही इसमें है की वो हर मुद्दे पर पहले आव देखें फिर ताव देखें और फिर अपना ऐसा मत रखें जो बाकी सभी के मतों से भिन्न हो। दुनिया के जितने लोगों से हमारा मत मिलेगा, हम उतने ही बड़े मूर्ख हैं।
लोगों के बीच एकमत्ता की तुलना मूर्खता से करना आपको शायद अटपटा लगे। लगना भी चाहिये। भई, सत्य तो अक्सर अटपटा होता है। ये भी हो सकता है कि मेरी इस बात को मानने के लिये आप तैयार ही ना हों। भई आप भी तो विद्वान हैं, मेरी तरह। लेकिन विद्वान होने के नाते, आपको अपनी बात मनवाना मेरा फर्ज बनता है। और इसके लिये, जैसे कि हर विद्वान के पास होते हैं, मेरे पास भी हैं – तर्क। आपके पास भी होंगे वितर्क, बशर्ते की आप विद्वान हों, जो बेशक आप होंगे ही। हमारे देश में सभी होते हैं। मेरा तर्क, आपका वितर्क। फिर मेरा वितर्क, आपका तर्क। तर्क-वितर्क। इस तरह तर्क-वितर्क से मतभेद, मतभेद बने रहते हैं और विद्वान, विद्वान।
विद्वता यह भी है कि विद्वान अपना तर्क देने से पहले श्रोताओं (यहाँ पाठकों) को यह याद दिला दे कि आगामी तर्क है किस मुद्दे पर। तो जनाब मुद्दा है कि लोगों के बीच मूर्खता को होना उनकी मूर्खता का परिचायक है कि नहीं। बिल्कुल है। मिसाल के तौर पर आप शादी को ही ले लीजिये। शादी यानि विवाह को अक्सर विवाहित लोग अपने जीवन के सबसे मूर्खतापूर्ण फैसलों के रूप में याद करते हैं। और आपने यदि गौर ना किया हो तो आपको गौर करा दूँ की विवाह तभी होता है जब विवाह में लिप्त दोनों पक्ष विवाह को लेकर सहमत हो जायें। सहमती हुई नहीं की विवाह घटित। किंतु इस पूरे संवाद के माध्यम से विवाहित लोगों को मूर्ख कहने का मेरा प्रयोजन कतई नहीं है। कहने की जरूरत ही नहीं है। इतिहास में ऐसे उदाहरण भी हैं जिसमें लोग, विवाहित होने के बावजूद भी विद्वान हुये हैं। बल्कि ज्यादातर मौकों पर तो लोग विद्वान ही विवाहित होने के बाद हुये। अक्सर आपने देखा होगा कि जो पति-पत्नी एक दूसरे से झगड़ते नहीं हैं, लोग उन्हें शक की निगाह से देखते हैं। देखना भी चाहिये। किसी महान कवि ने सच ही कहा है कि
विद्वान विवाहित वो हैं,
जिनकी राय हर मसले पर दो हैं।
भारत सरकार ने इस बात को बखूबी समझा और सुखी परिवार की परिभाषा दे डाली-
हम दो। हमारे दो।।
हाँलाकी कालान्तर में कुछ मूर्खों ने इसका प्रयोजन बच्चों से जोड़ना चाहा परंतु हमारे विद्वान विवाहितों ने इसके असली आशय को जाना और कम से कम बच्चों के लिये इसे कभी नहीं माना जैसा की आप हमारे देश की जनसंख्या को देखकर अंदाजा लगा सकते हैं। आदर्श पत्नी वह है जो सदैव अपने पति के साथ रहे और कभी पति का साथ ना दे। आदर्श पति वह है जो सदैव अपनी पत्नी का साथ दे, पर कभी अपनी पत्नी के साथ ना हो।
खैर चर्चा का विषय विद्वान हैं विवाहित नहीं, अतः मूद्दे से भटकने के लिये मैं मूआफी चाहूँगा। दरअसल मूद्दे से भटकना भी विद्वता की एक निशानी है। मुद्दे पर तो चपड़गँजू बात किया करते हैं। अब मूशर्रफ साहब को ही ले लीजिये। मुशर्रफ साहब जिस मुद्दे की खातिर हिंदोस्ताँ आये वो मुद्दा आज भी वहीं का वहीं है। हाँलाकी उस मुद्दे की एवज में उन्होने दिल्ली में अपना पुश्तैनी मकान भी घूम लिया, अपनी बेगम के साथ ताजमहल की तस्वीर भी खिंचवा ली, और अजमेर शरीफ में बच्चों की सलामती की दुआयें भी माँग लीं। अगर कहीं भूल-चूक में वो गलती से भी मुद्दे पर आ जाते और अल्हा खैर करे, मुद्दा हल हो जाता, तो पाकिस्तान के बाकी हुक्मरान क्या बैठकर झक मारते। भई उन्हें भी तो अपनी बेगमें घुमानी हैं हिंदोस्ताँ में। और फिर हिदोंस्ताँ के हुक्मरानों का क्या।
मुद्दे से भटकने से जहाँ एक ओर मुद्दा हल होने का डर चला जाता है, वहीं दूसरे मूद्दों के खड़े होने की संभावना भी बनी रहती है। और जैसा की पहले भी कहा गया है मुद्दे हैं तो मतभेद हैं और मतभेद हैं तो विद्वान। तो संक्षेप में अगर कहा जाये तो मतभेदों से विद्वान हैं, विद्वानों से मतभेद नहीं।
आप शायद सोच रहे हों की इस बकवास को लिखने के पीछे मेरा उद्देश्य क्या है। विद्वानों का बखान करना की मतभेदों का। आप को अपनी बात के लिये सहमत करना या एक और मुद्दा खड़ा करना। यकीन जानिये इस उद्देश्य को लेकर भी विद्वानों के बीच मतभेद ही है।