Tuesday, December 15, 2009
क्या और क्यों ?
Thursday, November 26, 2009
26/11 for An 8 Year Old
I am Pragati because my name is Pragati. Mom says Pragati means development and progress. She says that I am development and progress of India, so I am Pragati of India.
You know when this Pragati of India, I mean I was 7 years old I used to remember 3 important dates. 15th August because that is our happy Independence day, 26th January because that is our happy republic day and 18th August. 18th August... because that is my happy birthday.
Now Pragati of India, I mean I am 8 years old. Now Mom says that I have to remember one more day, 26th November. But I hate it because first it doesn't have a name and second Mom doesn't even let me use happy before it. I just don't get the point, If we can't use happy before it, then why should we remember it. Now I have the extra burden of remembering one more day in addition to huge syllabus already there. Would these days keep adding as I grow older. Did it happen to you also when you were 8. Does it create any additional burden on you also, this addition of new dates every year. I think I was better when I was 7.
Pragati Gupta
An 8 Year Old Kid
Tuesday, November 24, 2009
सचिन बनाम तेंदुल्कर
इस बार मुद्दा ये है कि लोग साफ तौर पर जानना चाहते हैं कि सचिन, तेंदुल्कर हैं या तेंदुल्कर, सचिन ? कौन बनेगा करोड़पति का गेम चालू है और एक करोड़ रुपये के लिये आखिरी प्रश्न है कि सचिन तेंदुल्कर क्या हैं ?
ऑप्शन ए) सचिन।
ऑप्शन बी) तेदुंल्कर।
उत्तर में केवल यही दो ही ऑप्शन्स हैं और कम्प्यूटर पर बैठे सचिन तेदुंल्कर पूरी तन्मयता से सोच रहे हैं कि वो सचिन हैं या तेंदुल्कर। और वो क्या, आज तो हमारे पूरे देश के सामने अहम मुद्दा ही ये है तभी तो देश के सारे बड़े नेता, तमाम अखबार और छोटे बड़े न्यूज़ चैनल पर एक ही डिस्कशन चालू है कि सचिन – सचिन हें कि तेंदुल्कर- तेंदुल्कर ? और अनगिनत ट्रॉफी जीतने वाले सचिन तेंदुल्कर, खुद एक ट्रॉफी की तरह शोकेस में पड़े पड़े इंतजार कर रहे हैं इस राष्ट्रव्यापी फैसले का।
इस वाकया से हमें हमारी जवानी के दिनों के वो दिन याद पड़ते हैं जब दाढ़ी-मूँछों का रौंआ भर आया होगा और हमने मौहल्ले के सारे लौंडे-लपाटों को इकट्ठा कर के टोली बनाई और मौहल्ले की लड़कियों के माईबाप हो गये। मजाल क्या जो कोई हमारे मौहल्ले की लड़की को आँख उठाकर भी देख ले। हमारे मौहल्ले की लौंडिया है हम छेड़ेंगे और कोई क्यों छेड़े ? लड़कियों के स्वामित्व की इस लड़ाई में जाने कितने मर खप गये पर लड़कियों को तो कभी खबर भी न हुई। जैसे – जैसे दाढ़ी मूँछ का रौंआ घना हुआ, वो लड़ाई तो खत्म हो गयी, अब ये नयी लड़ाई शुरु हुई है। फिक्र इसी बात की है अब ये लड़ाई करने वाले रौंयेदार दाढ़ी-मूँछ के लौंडे नहीं हैं, बल्कि पकी पकाई दाढ़ी-मूँछ वाले आदमी हैं। भगवान जाने ये लड़ाई कब खत्म होगी ?
Sunday, November 15, 2009
The Free Mistakes of Your Life!!!
Hi, Hope you are doing fine.
I recently happened to read one of your books with the name “The 3 Mistakes of My Life”. I hope you do remember that you wrote it. Well, actually it won’t be right to say that I happened to read it as I didn’t. I wasn’t travelling any long distance train for which I might need some book to kill my time. Neither, I am any more an MBA student who is ready to read any bullshit just to make sure that he doesn’t have to listen to the Glorified Management Jargons during the stupid lectures given by Who’s Who of the Industry. I am not a retired professional. I am not a tired professional. I am not a rich man’s house wife for whom moving the eyeballs while reading would be a good calorie burner and would therefore had to read on the prescription of some dietician. Incidentally, now that the question has arisen, let me clarify you that I am a male so I can never be a house wife though; I am ready to be a house husband in case any of working lady is interested. Coming back to same point, I am certainly not a patient admitted in the general ward of a government hospital who would any way have to read any book for want of other options. Overall, I am not any of those who might have had happened to read your book. And therefore I would like to correct myself from my earlier statement - “I recently happened to read one of your books….” to the statement- “ I recently read one of your books…… ”. So, when I was going to read it I knew well in advance what I was doing and I did it quite intentionally. I hope it would make you feel a little better.
You might not have given it so much of thought before you wrote it as to why you should write it the way you could be wondering now, to figure out, why on earth did I ever read your book, the way I have sensationalized it. India TV would hire me, I bet, on my terms if the HR ever happens to or plans to read this letter of mine. Don’t worry I won’t sensationalize it any further. So, here comes the reason as to why I read your book. I read your book because I felt it was human. In fact, every human being who ever read this book had read this book because it was human. They might not know that they read it because it was human to read it but it was, trust me on that. I know that animals can’t read but even if animals could read, it would still be only humans who would read this book because it is actually so human to read this book. You could feel better about it though you might be thinking was it actually so human but deep down inside you also know that it is. You always knew that it is and that is the precise reason why you wrote it and that is the only reason why readers read it. They were all humans, how they could not have.
Now, before I end this letter, let me give you an honest feedback for you like a human being would always do. Most of the humans whom I came across, who had read this book told me that it was not worth reading but I still did. So in the end, just to make you feel a little better (which I had promised somewhere in the middle that I would keep doing), let me confess before you that this book of yours is yet better than “In The Line Of Fire” by Mr. Parvez Musharraf about which, almost all had thought that his glorified book was not even worth writing. At least nobody felt so about yours. So, you score some points over him. I hope it does make you feel better.
VINEET GARG
(Fellow Human)
Saturday, September 5, 2009
फेयरवैल पर कुछ भी!
मैंने ख्वाब एक ही पाला था।
दिल की बातें दो चार करे,
मुझसे भी कोई प्यार करे।
जब भी देखी कोई सुकुमारी,
मैंने ये आँख वहीं मारी।
कुछ घबराईं, कुछ शर्माईं,
कुछ पापाजी को लें आईं।
इस इश्क ने यूँ बरबाद किया,
कि गुरुजनों ने याद किया।
वे पूज्य हमारे गुरू हुये,
अब उनके भाषण शुरू हुये।
सपनों की लंका दहन हुई,
अब से हर लड़की बहन हुई।
बस बात यही मन के अंदर,
हर बहन लगे मुझको सुंदर।
कितनी अच्छी ये बहनें हैं,
इतने कम कपड़े पहनें हैं।
धीरे – धीरे हम बड़े हुये,
दोनों पैरों पर खड़े हुये।
किस्मत मैरी (MERI) में ले आई,
जहाँ एक नहीं कन्या पाई।
हर दिशा में ढूंढा बढ़ चढ़ के,
हर तरफ मिले लड़के लड़के।
अब पाप किया तो होना क्या,
अब चार साल तक होना क्या।
लड़कों का भला मैं करता क्या,
मैं यूँहीं आहें भरता क्या।
सबने मुझको, मैने सबको डसा,
हर बंदे में था साँप बसा।
साँपों को अपना गुरू किया,
और कविता लिखना शुरू किया।
क्या मैस हुई, क्या क्लास हुई,
रैंक होल्डरशिप तो खास हुई।
पी.जी.एम. और सी.एम. वाली,
हर चीज़ पे कविता लिख डाली।
जैसे ही दुखी हम कभी हुये,
हम हास्य मंच के कवि हुये।
रैंक होल्डरशिप की चाह नहीं,
पी.जी.एम. की भी परवाह नहीं।
सी.एम. तक मेरे काट लिया,
तीनों वॉर्डन ने बाँट लिया।
धीरे धीरे सब बीत गया,
मेरा धैर्य फिर जीत गया।
और फिर मैंने इतिहास किया,
कि ग्रांड वाइवा भी पास किया।
अब दूर हुई सारी बाधा,
अरी अब तो मिल जा ओ राधा।।
Monday, July 20, 2009
विद्वानों के बीच मतभेद है।
लोगों के बीच एकमत्ता की तुलना मूर्खता से करना आपको शायद अटपटा लगे। लगना भी चाहिये। भई, सत्य तो अक्सर अटपटा होता है। ये भी हो सकता है कि मेरी इस बात को मानने के लिये आप तैयार ही ना हों। भई आप भी तो विद्वान हैं, मेरी तरह। लेकिन विद्वान होने के नाते, आपको अपनी बात मनवाना मेरा फर्ज बनता है। और इसके लिये, जैसे कि हर विद्वान के पास होते हैं, मेरे पास भी हैं – तर्क। आपके पास भी होंगे वितर्क, बशर्ते की आप विद्वान हों, जो बेशक आप होंगे ही। हमारे देश में सभी होते हैं। मेरा तर्क, आपका वितर्क। फिर मेरा वितर्क, आपका तर्क। तर्क-वितर्क। इस तरह तर्क-वितर्क से मतभेद, मतभेद बने रहते हैं और विद्वान, विद्वान।
विद्वता यह भी है कि विद्वान अपना तर्क देने से पहले श्रोताओं (यहाँ पाठकों) को यह याद दिला दे कि आगामी तर्क है किस मुद्दे पर। तो जनाब मुद्दा है कि लोगों के बीच मूर्खता को होना उनकी मूर्खता का परिचायक है कि नहीं। बिल्कुल है। मिसाल के तौर पर आप शादी को ही ले लीजिये। शादी यानि विवाह को अक्सर विवाहित लोग अपने जीवन के सबसे मूर्खतापूर्ण फैसलों के रूप में याद करते हैं। और आपने यदि गौर ना किया हो तो आपको गौर करा दूँ की विवाह तभी होता है जब विवाह में लिप्त दोनों पक्ष विवाह को लेकर सहमत हो जायें। सहमती हुई नहीं की विवाह घटित। किंतु इस पूरे संवाद के माध्यम से विवाहित लोगों को मूर्ख कहने का मेरा प्रयोजन कतई नहीं है। कहने की जरूरत ही नहीं है। इतिहास में ऐसे उदाहरण भी हैं जिसमें लोग, विवाहित होने के बावजूद भी विद्वान हुये हैं। बल्कि ज्यादातर मौकों पर तो लोग विद्वान ही विवाहित होने के बाद हुये। अक्सर आपने देखा होगा कि जो पति-पत्नी एक दूसरे से झगड़ते नहीं हैं, लोग उन्हें शक की निगाह से देखते हैं। देखना भी चाहिये। किसी महान कवि ने सच ही कहा है कि
विद्वान विवाहित वो हैं,
जिनकी राय हर मसले पर दो हैं।
भारत सरकार ने इस बात को बखूबी समझा और सुखी परिवार की परिभाषा दे डाली-
हम दो। हमारे दो।।
हाँलाकी कालान्तर में कुछ मूर्खों ने इसका प्रयोजन बच्चों से जोड़ना चाहा परंतु हमारे विद्वान विवाहितों ने इसके असली आशय को जाना और कम से कम बच्चों के लिये इसे कभी नहीं माना जैसा की आप हमारे देश की जनसंख्या को देखकर अंदाजा लगा सकते हैं। आदर्श पत्नी वह है जो सदैव अपने पति के साथ रहे और कभी पति का साथ ना दे। आदर्श पति वह है जो सदैव अपनी पत्नी का साथ दे, पर कभी अपनी पत्नी के साथ ना हो।
खैर चर्चा का विषय विद्वान हैं विवाहित नहीं, अतः मूद्दे से भटकने के लिये मैं मूआफी चाहूँगा। दरअसल मूद्दे से भटकना भी विद्वता की एक निशानी है। मुद्दे पर तो चपड़गँजू बात किया करते हैं। अब मूशर्रफ साहब को ही ले लीजिये। मुशर्रफ साहब जिस मुद्दे की खातिर हिंदोस्ताँ आये वो मुद्दा आज भी वहीं का वहीं है। हाँलाकी उस मुद्दे की एवज में उन्होने दिल्ली में अपना पुश्तैनी मकान भी घूम लिया, अपनी बेगम के साथ ताजमहल की तस्वीर भी खिंचवा ली, और अजमेर शरीफ में बच्चों की सलामती की दुआयें भी माँग लीं। अगर कहीं भूल-चूक में वो गलती से भी मुद्दे पर आ जाते और अल्हा खैर करे, मुद्दा हल हो जाता, तो पाकिस्तान के बाकी हुक्मरान क्या बैठकर झक मारते। भई उन्हें भी तो अपनी बेगमें घुमानी हैं हिंदोस्ताँ में। और फिर हिदोंस्ताँ के हुक्मरानों का क्या।
मुद्दे से भटकने से जहाँ एक ओर मुद्दा हल होने का डर चला जाता है, वहीं दूसरे मूद्दों के खड़े होने की संभावना भी बनी रहती है। और जैसा की पहले भी कहा गया है मुद्दे हैं तो मतभेद हैं और मतभेद हैं तो विद्वान। तो संक्षेप में अगर कहा जाये तो मतभेदों से विद्वान हैं, विद्वानों से मतभेद नहीं।
आप शायद सोच रहे हों की इस बकवास को लिखने के पीछे मेरा उद्देश्य क्या है। विद्वानों का बखान करना की मतभेदों का। आप को अपनी बात के लिये सहमत करना या एक और मुद्दा खड़ा करना। यकीन जानिये इस उद्देश्य को लेकर भी विद्वानों के बीच मतभेद ही है।
Saturday, June 6, 2009
मरीन इंजिनीयर्स निराश क्यों ?
मरीन इंजिनीयर्स निराश क्यों ?
-विनीत गर्ग (5581)
भूमिका:-
सन् 2004 के 20 साल आगे यानी 2024 को सेट-अप है। मैं hopefully शादी-शुदा हूँ, obviously मेरी एक बीवी है और expectedly मेरा एक बेटा है (नाम जो भी हो)। Undoubtedly , मैं दुखी हूँ और ये समझता हूँ कि इसीलिये दुखी हूँ क्योंकि मरीन इंजिनीयर हूँ या इसलिये क्योंकि शादी हो चुकी है। खैर एक दिन प्यार में आकर मैनें अपने बेटे से पूछ लिया कि बेटा तुम क्या करना चाहते हो और उसने मुझे जवाब दिया कि वो मरीन इंजिनीयर बनना चाहता है। बस मेरा दिमाग खराब हो गया वहीं.......
मैं-
अरी भाग्यवान! तुमने मेरे बेटे को ये क्या सिखाया है ?
फूल से बच्चे को ऐसा सपना दिखाया है ?
पत्नी-
अजी, तुम्हारा बेटा भी तुम्हारी ही तरह नालायक है।
और कुछ नहीं, बस ये मरीन इंजिनीयर ही बनने लायक है।।
मैं-
हे भगवान! तूने मेरी जिंदगी में कौन सी ल्यूब ऑइल डाली है!
माँ तो माँ, बेटे की खोपड़ी भी एक दम खाली है।।
रत्ती भर जो शक था वो भी आज साफ हो गया।
तू मेरा ही बेटा है मुझे विश्वास हो गया।।
बेटे इसीलिये, तुमसे हॉरर मुवी देखने को मना करते हैं।
ऐसे सपने देखते हो जिनसे पिताजी तक डरते हैं।।
मेरे राजा, मेरे बेटा, अच्छे बच्चे कहना मानते हैं।
तुम्हारे पिताजी, मरीन इंजिनीयरिंग की एक एक चीज जानते हैं।।
बेटे इस लाइन में बहुत रगड़ाई है।
मेहनत बहुत है, हार्डकोर पढ़ाई है।।
जब 6-6 घंटे तक लगातार ई.डी. बनायेगा,
और बसों में धक्के खाकर, हुगली वर्कशॉप जायेगा,
क्या तू सुबह-सुबह पी.टी. के लिये उठ पायेगा।
और इतने पर भी जब शाम को रोज मार्चिंग जायेगा,
तब तेरे को तेरा बाप याद आयेगा।।
स्टॉकिंग्स नीचे जाते ही सी.एम. कट जायेंगे।
छोटी छोटी बात पर ओ.आई.सी. बैक टाइम लगायेंगे।।
बेटा, तू मुझे देख और कुछ सीख,
शिप पे होता हूँ तो घर की याद आती है।
और घर पे रोलिंग-पिचिंग के बिना नींद नहीं आती है।।
आज मेरी अपनी बीवी मेरा कहना नहीं मानती।
अड़ोसी-पड़ोसियों की बीवियाँ भी मुझे नहीं जानतीं।।
बेटे अगर मेरे चेहरे में तुझे तेरा बाप नज़र आता है,
और उस बाप पे तुझे थोड़ा भी तरस आता है,
तो बेटा मेरी मान, ये सपना छोड़ दे।
अपना स्टीयरिंग गीयर 35 डिग्री पोर्ट साइड मोड़ दे।।
पुत्र-
पिताजी! आप भी कैसी अजीब-अजीब सी बात करते रहते हैं।
जब देखो तब, लोगों को डसते रहते हैं।।
ये जो बार बार आप अपने दुखों की दुहई देते हैं,
और उसमें अपने प्रोफेशन को घसीट लेते हैं,
ये एक मर्द की पहचान नहीं है।
बताओ आज किस प्रोफेशन में दुखी इंसान नहीं है।।
जब से आपको बाप माना है, जिंदगी में सिर्फ इतना जाना है,
जान हथेली पर रखकर खेलता हूँ। आप क्या जानो आपको कैसे झेलता हूँ।।
और सुनिये,
6 घंटे तक ई.डी. तो दो चार ही बनाते हैं।
बाकी तो सिर्फ नेम प्लेट से ही काम चलाते हैं।।
छोटी छोटी बात पर अगर सी.एम. नहीं कटवाऊँगा,
तो क्या एफ.पी.ओ. पर पी.जी.एम. नहीं ले जाऊँगा।।
माना कि लाइफ में थोड़ा पेन है।
पर कम से कम जॉब तो सर्टेन है।।
विद आऊट टैक्स वाइट मनी कमा सकते हैं।
फ्री में विदेश घूम कर आ सकते हैं।।
फालतू में इस प्रोफेशन को क्यों कोसते हैं।
मन में ढूँढने के बजाय बाहर शांती खोजते हैं।।
और आप जो बीवी की बात करते हैं।
तो पत्नी के आगे तो बड़े बड़े पानी भरते हैं।।
अरे पिताजी यही तो एक मात्र ऐसा प्रोफेशन है।
जिसमें कम से कम 6 महीने तो बीवी से एक्सेम्पशन है।।
पिताजी! ये दरअसल मेरे प्यार की परीक्षा है।
ये मेरी नहीं, मेरी गर्लफ्रेंड की इक्छा है।।
वो तो उसके नैन सिर्फ मुझसे लड़े हैं।
वरना मरीन इंजिनीयर बनने को तो जाने कितने खड़े हैं।।
अगर आज पी.टी. और मार्चिंग से घबराऊँगा।
तो आपकी तरह अरेंज्ड मैरिज के चक्कर में फंस जाऊँगा।।
प्यार की तो पहली ही शर्त कुर्बानी है।
तभी तो मैंने मरीन इंजिनीयर बनने की ठानी है।।
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