Thursday, April 5, 2012
Sunday, March 25, 2012
कलम-क्रांति।
मैं लिखता हूँ,
तुम पढ़ो,
और कुछ करो।
प्रेरणा...???
प्रेरणा की तुम फिकर मत करो,
मैं लिख तो रहा हूँ।
तुम पढ़ो,
और आगे बढ़ो।
तुममें अथाह शक्ति है,
तुम हनुमान हो,
पर कर क्या सकते हो,
तुम इस बात से ही अनजान हो।
मैं तुम्हारी खातिर जाम्वंत बनूँगा,
मैं लिखूँगा,
ताकि तुम पढ़ो,
और आगे बढ़ो।
तुम्हें इल्म है...???
क्या ख्वाब है,
क्या हकीकत है ?
तुम्हें खयाल है...???
समाज को तुम्हारी,
कितनी जरूरत है।
मैं तुम्हें बताऊँगा।
मेरी कवितायें पढ़ो,
मेरी कहानियाँ समझो,
और मेरे नाटक देखो,
तुम्हें गलत का ज्ञान होगा,
सही का, पहचान होगा।
तुम्हें एहसास होगा,
कि देश जल रहा है,
और तुम्हारा पौरूष...
ड्रॉइंग रूम में बैठा,
हाथ मल रहा है।
खड़े हो जाओ,
तलवार उठा लो,
दुनिया बदल डालो।
और प्रेरणा की तुम फिकर मत करो,
मैं लिख तो रहा हूँ,
तुम पढ़ो,
और आगे बढ़ो।
इतिहास गवाह है,
जब-जब किसी ने कलम उठाई है,
क्रांति आई है।
रामायण देख लो,
वाल्मीकी जी ने कही,
रामचंद्र जी ने लंका ढही।
महाभारत,
व्यास ने रची,
तब जाके मची।
और भारत...,
भारत जो आज आज़ाद है,
किसी की कलम का ही तो हाथ है।
कृष्ण जी ने गीता गढ़ी,
गाँधी जी ने पढ़ी,
इधर गाँधी जी इंस्पायर हुये,
उधर अंग्रेज देश से बाहर हुये।
मैं भी तुम्हें इंस्पिरेशन दूँगा,
मैं लिखूँगा,
तुम पढ़ो,
और आगे बढ़ो।
यही तो क्रांति की रीति है,
लिखने वाले लिखें,
लड़ने वाले पढ़ें,
और पढ़ने वाले लड़ें।
कलम मैंने उठा ली है,
तलवार तुम उठा लो,
और दुनिया बदल डालो,
और क्रांति,
क्रांति तो बस अब आई समझो,
मैं लिख तो रहा हूँ,
तुम बस पढ़ो,
आगे बढ़ो,
लड़ो,
और कुछ करो।
तुम पढ़ो,
और कुछ करो।
प्रेरणा...???
प्रेरणा की तुम फिकर मत करो,
मैं लिख तो रहा हूँ।
तुम पढ़ो,
और आगे बढ़ो।
तुममें अथाह शक्ति है,
तुम हनुमान हो,
पर कर क्या सकते हो,
तुम इस बात से ही अनजान हो।
मैं तुम्हारी खातिर जाम्वंत बनूँगा,
मैं लिखूँगा,
ताकि तुम पढ़ो,
और आगे बढ़ो।
तुम्हें इल्म है...???
क्या ख्वाब है,
क्या हकीकत है ?
तुम्हें खयाल है...???
समाज को तुम्हारी,
कितनी जरूरत है।
मैं तुम्हें बताऊँगा।
मेरी कवितायें पढ़ो,
मेरी कहानियाँ समझो,
और मेरे नाटक देखो,
तुम्हें गलत का ज्ञान होगा,
सही का, पहचान होगा।
तुम्हें एहसास होगा,
कि देश जल रहा है,
और तुम्हारा पौरूष...
ड्रॉइंग रूम में बैठा,
हाथ मल रहा है।
खड़े हो जाओ,
तलवार उठा लो,
दुनिया बदल डालो।
और प्रेरणा की तुम फिकर मत करो,
मैं लिख तो रहा हूँ,
तुम पढ़ो,
और आगे बढ़ो।
इतिहास गवाह है,
जब-जब किसी ने कलम उठाई है,
क्रांति आई है।
रामायण देख लो,
वाल्मीकी जी ने कही,
रामचंद्र जी ने लंका ढही।
महाभारत,
व्यास ने रची,
तब जाके मची।
और भारत...,
भारत जो आज आज़ाद है,
किसी की कलम का ही तो हाथ है।
कृष्ण जी ने गीता गढ़ी,
गाँधी जी ने पढ़ी,
इधर गाँधी जी इंस्पायर हुये,
उधर अंग्रेज देश से बाहर हुये।
मैं भी तुम्हें इंस्पिरेशन दूँगा,
मैं लिखूँगा,
तुम पढ़ो,
और आगे बढ़ो।
यही तो क्रांति की रीति है,
लिखने वाले लिखें,
लड़ने वाले पढ़ें,
और पढ़ने वाले लड़ें।
कलम मैंने उठा ली है,
तलवार तुम उठा लो,
और दुनिया बदल डालो,
और क्रांति,
क्रांति तो बस अब आई समझो,
मैं लिख तो रहा हूँ,
तुम बस पढ़ो,
आगे बढ़ो,
लड़ो,
और कुछ करो।
Thursday, January 26, 2012
मैं लड़ता रहुँगा।
बादलों का आगे, धुंधलके में छिपकर,
जो दिखती नहीं है, वो मंजिल है मेरी।
मुंबई की लोकल की भीड़ में पिसकर भी,
पिसती नहीं जो वो चाहत है मेरी।
मंजिल की मुझसे दूरी ना देखो,
पैदल हूँ, ये भी मजबूरी ना देखो।
इस जिस्म की डेढ़ पसली ना देखो,
चप्पल की घिसती तली भी ना देखो।
ना परखो, मेरे हुनर की भी नोकें,
ना ताको, हवाओं के रुख के भी झोंके,
उम्र का भी मेरी, गणित ना लगाना,
अपने तजुर्बे पर भी ना जाना..।
पा लूँगा मंजिल, कोई कारण नहीं है,
इतिहास में भी उदाहरण नहीं है।
इतिहास भी पर भविष्य ही जब था,
वो भी कहाँ कम, असंभव से कब था।
हर कसौटी की तुम्हारी हदें तोड़ दूँगा,
परे मैं, वो सारी, वजह छोड़ दूँगा।
जो रोकेंगी मुझको, मेरे रास्ते से,
जो टोकेंगी मुझको, मेरे रास्ते में।
जीतूँगा मैं ही ये लिख लो अभी से,
खिला दूँगा कलियाँ, मैं कली मरुजमीं से।
मुझे बस यकीं है, चाहत पे मेरी,
मैं लड़ता रहूँगा, कितनी हो देरी।
मैं लड़ता रहूँगा, कितनी हो देरी।
जो दिखती नहीं है, वो मंजिल है मेरी।
मुंबई की लोकल की भीड़ में पिसकर भी,
पिसती नहीं जो वो चाहत है मेरी।
मंजिल की मुझसे दूरी ना देखो,
पैदल हूँ, ये भी मजबूरी ना देखो।
इस जिस्म की डेढ़ पसली ना देखो,
चप्पल की घिसती तली भी ना देखो।
ना परखो, मेरे हुनर की भी नोकें,
ना ताको, हवाओं के रुख के भी झोंके,
उम्र का भी मेरी, गणित ना लगाना,
अपने तजुर्बे पर भी ना जाना..।
पा लूँगा मंजिल, कोई कारण नहीं है,
इतिहास में भी उदाहरण नहीं है।
इतिहास भी पर भविष्य ही जब था,
वो भी कहाँ कम, असंभव से कब था।
हर कसौटी की तुम्हारी हदें तोड़ दूँगा,
परे मैं, वो सारी, वजह छोड़ दूँगा।
जो रोकेंगी मुझको, मेरे रास्ते से,
जो टोकेंगी मुझको, मेरे रास्ते में।
जीतूँगा मैं ही ये लिख लो अभी से,
खिला दूँगा कलियाँ, मैं कली मरुजमीं से।
मुझे बस यकीं है, चाहत पे मेरी,
मैं लड़ता रहूँगा, कितनी हो देरी।
मैं लड़ता रहूँगा, कितनी हो देरी।
Tuesday, November 22, 2011
मुंबई के मेंढक।
मेंढकों में होड़ हो गई,
कि मुंबई किसके बाप की है।
दोमुहेँ केंचुओं ने अपने-अपने मेंढक चुने,
और बोले,
हुजूर आपकी है।
हुजूर आपकी है।
फैसला फिर अटक गया।
मुंबई का बाप पता चलते-चलते,
बीच में ही लटक गया।
मेंडकों का दिमाग सटक गया।
मक्खियाँ भिनभिनाईं
कि हुजूर
इंसानों में जब भी,
इस तरह का विवाद हुआ है,
बापों का फैसला,
माँओं से पूछने के बाद हुआ है।
ततैये तमतमा उठे,
और उड़-उड़कर झाँकते हुए बोले,
कि हुजूर...
इंसानों को तो हम बड़ा पीछे छोड़ आये हैं
उतना पीछे जाने में,
और माँ का पता लगाने में,
तो बड़ा वक्त बीत जायेगा,
तब तक तो कोई और रेस जीत जायेगा।
इस पर,
घोंघे ने हिलने का कष्ट किया,
और अपना पक्ष स्पष्ट किया,
हुजूर....
हुकुम करें,
घोंघे पूरा मुंबई रोक देंगे,
कोई हिला, वहीँ ठोक देंगे।
बात मेंढकों के जम गई,
मुंबई घोंघे की तरह, थम गई,
मेंढक फुदक-फुदक कर टरटराये,
मुंबई किसके बाप की है।
मुंबई किसके बाप की है
दोमुहेँ केंचुओं ने अपने-अपने मेंढक चुने,
और बोले,
हुजूर आपकी है।
हुजूर आपकी है।
कि मुंबई किसके बाप की है।
दोमुहेँ केंचुओं ने अपने-अपने मेंढक चुने,
और बोले,
हुजूर आपकी है।
हुजूर आपकी है।
फैसला फिर अटक गया।
मुंबई का बाप पता चलते-चलते,
बीच में ही लटक गया।
मेंडकों का दिमाग सटक गया।
मक्खियाँ भिनभिनाईं
कि हुजूर
इंसानों में जब भी,
इस तरह का विवाद हुआ है,
बापों का फैसला,
माँओं से पूछने के बाद हुआ है।
ततैये तमतमा उठे,
और उड़-उड़कर झाँकते हुए बोले,
कि हुजूर...
इंसानों को तो हम बड़ा पीछे छोड़ आये हैं
उतना पीछे जाने में,
और माँ का पता लगाने में,
तो बड़ा वक्त बीत जायेगा,
तब तक तो कोई और रेस जीत जायेगा।
इस पर,
घोंघे ने हिलने का कष्ट किया,
और अपना पक्ष स्पष्ट किया,
हुजूर....
हुकुम करें,
घोंघे पूरा मुंबई रोक देंगे,
कोई हिला, वहीँ ठोक देंगे।
बात मेंढकों के जम गई,
मुंबई घोंघे की तरह, थम गई,
मेंढक फुदक-फुदक कर टरटराये,
मुंबई किसके बाप की है।
मुंबई किसके बाप की है
दोमुहेँ केंचुओं ने अपने-अपने मेंढक चुने,
और बोले,
हुजूर आपकी है।
हुजूर आपकी है।
Monday, November 14, 2011
समझौता।
हमारा समझौता हो गया है,
ना मैं उसकी तारीफ करता हूँ,
ना वो मेरी।
किसी ने किसी से कुछ नहीं कहा।
बिन कहे ही हम समझ गये कि,
हमारा समझौता हो गया है।
पहले उसने लिखना शुरू किया था,
और मैंने तारीफ करना।
फिर उसकी देखा-देखी,
मैंने लिखना शुरू कर दिया,
और मेरी देखा-देखी,
उसने तारीफ करना।
हम दोनों अच्छा लिखते थे।
फिर एक दिन मुझे लगा,
कि मैं ज्यादा अच्छा लिखता हूँ,
और उसे लगा वो।
उसे लगा,
वो ज्यादा तारीफ का हकदार है,
और मुझे लगा मैं।
बस उसी दिन से,
हमारा समझौता हो गया है,
ना मैं उसकी तारीफ करता हूँ,
ना वो मेरी।
ना मैं उसकी तारीफ करता हूँ,
ना वो मेरी।
किसी ने किसी से कुछ नहीं कहा।
बिन कहे ही हम समझ गये कि,
हमारा समझौता हो गया है।
पहले उसने लिखना शुरू किया था,
और मैंने तारीफ करना।
फिर उसकी देखा-देखी,
मैंने लिखना शुरू कर दिया,
और मेरी देखा-देखी,
उसने तारीफ करना।
हम दोनों अच्छा लिखते थे।
फिर एक दिन मुझे लगा,
कि मैं ज्यादा अच्छा लिखता हूँ,
और उसे लगा वो।
उसे लगा,
वो ज्यादा तारीफ का हकदार है,
और मुझे लगा मैं।
बस उसी दिन से,
हमारा समझौता हो गया है,
ना मैं उसकी तारीफ करता हूँ,
ना वो मेरी।
Monday, October 31, 2011
एक और मुनादी।
सुनो – सुनो – सुनो
सुनो – सुनो – सुनो
सर्वसाधारण को सूचित किया जाता है,
और प्रशासन की प्राथमिकताओं से,
परीचित किया जाता है
कि गरीबी हटा दी जायेगी,
जनसंख्या जल्द से जल्द घटा दी जायेगी,
बिजली-पानी की किल्लत दूर होगी,
भुखमरी खुद हमें छोड़ने को मजबूर होगी।
खेत-खलिहान खड़े होकर लहलहायेंगे,
और कऊए चिड़ियों की तरह चहचहायेंगे।
प्रशासन को हर्ष है,
कि अभी आजादी का मात्र पैंसठवा ही वर्ष है,
और प्रशासन की पचहत्तरवीं पंचवर्षीय योजना का,
पन्द्रहवाँ प्रारूप पहले ही तैयार है,
बस योजना परिषद के प्रधान पदाधिकारियों से,
प्रस्ताव पारित होने का इंतजार है।
परिकल्पना के परे के परीलोक का वो प्यारा सपना,
अब पूरा होने वाला है
जिसमें जालसाज़ को जेल,
और सच्चे का बोलबाला है।
प्रशासन जानता है,
जनता ने इंतजार किया है।
प्रशासन मानता है,
भरोसा बार-बार किया है।
प्रशासन शुक्रगुज़ार है।
प्रशासन आश्वस्त करता है,
कि भले कितना भी लंबा समर होगा,
पर प्रजातंत्र का अपना सुंदर सपना,
एक दिन ज़रूर अमर होगा।
प्रशासन समझता है,
प्रजातंत्र में प्रतिरोध व प्रदर्शन,
बुनियादी हक है, ज़रूरी है,
परंतु प्रशासन की अपनी,
प्रशासनिक मजबूरी है।
फिर भी प्रशासन प्रजा को,
प्रतिरोध प्रदर्शन का हक प्रदान करता है,
किंतु कानून व्यवस्था की खातिर,
प्रदर्शकों को सावधान करता है,
कि प्रदर्शन के लिये कम-स-कम,
छः माह पूर्व परमिट लेना होगा।
और प्रार्थना-पत्र में प्रदर्शन के कारणो का लिखित ब्यौरा
संलग्न प्रमाण सहित देना होगा।
प्रशासन प्रार्थना-पत्र पर विचार करेगी,
उपयुक्त कारणों पर प्रदर्शन का आवेदन-पत्र
अवश्य स्वीकार करेगी।
प्रदर्शन में भूखे रहने पर सख्त मनाही होगी,
जलसों और जुलूसों पर कानूनन कार्यवाही होगी,
मशालों के प्रयोग पर पर्यावरण विभाग की पाबंदी होगी,
महज़ महकने वाली मोमबत्तियों पर प्रशासन की रज़ामंदी होगी।
प्रशासनिक क्षेत्र की प्रशासनिक सीमा में,
पाँच से अधिक प्रदर्शकों का समूह नहीं बना सकते हैं।
पारित पद्धति के अंतर्गत,
प्रदर्शनकारी सिर्फ तालियाँ बजा सकते हैं।
ध्यान रहे, ध्वनि तरंगो का माप पचास डैसीबेल से कम होना चाहिये,
प्रदर्शन पौने आठ बजे शुरू होकर पौने नौ से पहले खतम होना चाहिये।
प्रशासनिक पदाधिकारी भी इंसान है, नौ बजे के पश्चात वो सोता है,
शोर-शराबे से, उसके पारीवारिक जीवन में खलल होता है।
यदि प्रदर्शन इसके बाद, एक पल भी चलाया जायेगा,
तो प्रायोजकों पर, पाँच सौ रूपये प्रति पल प्रति प्रदर्शनकारी चार्ज लगाया जायेगा।
प्रशासन चाहता है,
कि प्रदर्शन में समाज के सभी वर्गों की भागीदारी हो,
प्रदर्शकों में पन्द्रह प्रतिशत अनुसूचित जाती, साढ़े सात जनजाती,
सत्त्ताईस में अन्य पिछड़े और तैंतीस प्रतिशत में अबला नारी हो।
इसके अतिरिक्त प्रस्तावित प्रतिरोध प्रदर्शन में,
प्रत्येक सम्प्रदाय का प्रतिनिधित्व होना चाहिये,
क्योंकि एक धर्मनिर्पेक्ष शासन प्रणाली में,
प्रदर्शन भी तो धर्मनिर्पेक्ष होना चाहिये।
प्रदर्शन के लिये प्रस्तावित पुलिस सुरक्षा का,
पूरा खर्चा प्रदर्शकों को खुद सहन करना होगा।
यदि शाँती व्यवस्था बिगड़ी,
तो पाँच लाख रूपये का अतिरिक्त आर्थिक दंड वहन करना होगा।
प्रदर्शन से प्राप्त आमदनी और खर्चे की कर-अधिकारियों द्वारा जाँच होगी,
उद्घाटित प्रायोजकों के व्यक्तिगत मामलों पर सार्वजनिक रूप से पूछताछ होगी।
यदि प्रायोजकों की छवि पूरी तरह से क्लीन होगी,
केवल तभी प्रदर्शन के लिये प्रशासन की सिग्नल ग्रीन होगी चाहिये।
प्रदर्शन कब, कहाँ और कैसे करना है,
ये प्रशासन बतायेगा,
तय राशी के अदायगी पर,
प्रदर्शन के लिये प्रमुख सुविधायें भी,
प्रशासन मुहैय्या करायेगा।
किंतु प्रदर्शन में प्रशासन के विरूद्ध,
कोई नारा नहीं होगा।
प्रशासनिक पदाधिकारी की कार्यप्रणाली पर भी प्रश्न,
गवारा नहीं होगा।
प्रशासन जानता है,
जनता साथ देगी,
प्रशासन के हाथ में,
हमेशा की तरह अपना हाथ देगी।
प्रशासन जनता की,
समस्त समस्याओं के समाधान हेतु तत्पर है,
और कुछ को तो बिल्कुल,
सुलझा देने की हद पर है।
प्रशासन का... अपना एक संविधान है,
जिसमें... प्रत्येक प्रश्न को सुलझाने का प्रावधान है।
परंतु.. प्रशासनिक प्रणाली में,
कुछ वक्त लगता है।
और इसीलिये प्रशासन जनता से,
ये उम्मीद रखता है,
प्रशासनिक मामलों में,
जनता सब्र करे।
और कुछ नहीं तो प्रशासन की प्रतिबद्धता,
पर ही फक्र करे।
प्रशासन, पहले से धन्यवाद प्रेषित करता है।
और मुनादी का अनुपालन अपेक्षित करता है।
आज्ञा से-
प्रशासन,
प्रजा की सेवा में तत्पर।
सुनो – सुनो – सुनो
सर्वसाधारण को सूचित किया जाता है,
और प्रशासन की प्राथमिकताओं से,
परीचित किया जाता है
कि गरीबी हटा दी जायेगी,
जनसंख्या जल्द से जल्द घटा दी जायेगी,
बिजली-पानी की किल्लत दूर होगी,
भुखमरी खुद हमें छोड़ने को मजबूर होगी।
खेत-खलिहान खड़े होकर लहलहायेंगे,
और कऊए चिड़ियों की तरह चहचहायेंगे।
प्रशासन को हर्ष है,
कि अभी आजादी का मात्र पैंसठवा ही वर्ष है,
और प्रशासन की पचहत्तरवीं पंचवर्षीय योजना का,
पन्द्रहवाँ प्रारूप पहले ही तैयार है,
बस योजना परिषद के प्रधान पदाधिकारियों से,
प्रस्ताव पारित होने का इंतजार है।
परिकल्पना के परे के परीलोक का वो प्यारा सपना,
अब पूरा होने वाला है
जिसमें जालसाज़ को जेल,
और सच्चे का बोलबाला है।
प्रशासन जानता है,
जनता ने इंतजार किया है।
प्रशासन मानता है,
भरोसा बार-बार किया है।
प्रशासन शुक्रगुज़ार है।
प्रशासन आश्वस्त करता है,
कि भले कितना भी लंबा समर होगा,
पर प्रजातंत्र का अपना सुंदर सपना,
एक दिन ज़रूर अमर होगा।
प्रशासन समझता है,
प्रजातंत्र में प्रतिरोध व प्रदर्शन,
बुनियादी हक है, ज़रूरी है,
परंतु प्रशासन की अपनी,
प्रशासनिक मजबूरी है।
फिर भी प्रशासन प्रजा को,
प्रतिरोध प्रदर्शन का हक प्रदान करता है,
किंतु कानून व्यवस्था की खातिर,
प्रदर्शकों को सावधान करता है,
कि प्रदर्शन के लिये कम-स-कम,
छः माह पूर्व परमिट लेना होगा।
और प्रार्थना-पत्र में प्रदर्शन के कारणो का लिखित ब्यौरा
संलग्न प्रमाण सहित देना होगा।
प्रशासन प्रार्थना-पत्र पर विचार करेगी,
उपयुक्त कारणों पर प्रदर्शन का आवेदन-पत्र
अवश्य स्वीकार करेगी।
प्रदर्शन में भूखे रहने पर सख्त मनाही होगी,
जलसों और जुलूसों पर कानूनन कार्यवाही होगी,
मशालों के प्रयोग पर पर्यावरण विभाग की पाबंदी होगी,
महज़ महकने वाली मोमबत्तियों पर प्रशासन की रज़ामंदी होगी।
प्रशासनिक क्षेत्र की प्रशासनिक सीमा में,
पाँच से अधिक प्रदर्शकों का समूह नहीं बना सकते हैं।
पारित पद्धति के अंतर्गत,
प्रदर्शनकारी सिर्फ तालियाँ बजा सकते हैं।
ध्यान रहे, ध्वनि तरंगो का माप पचास डैसीबेल से कम होना चाहिये,
प्रदर्शन पौने आठ बजे शुरू होकर पौने नौ से पहले खतम होना चाहिये।
प्रशासनिक पदाधिकारी भी इंसान है, नौ बजे के पश्चात वो सोता है,
शोर-शराबे से, उसके पारीवारिक जीवन में खलल होता है।
यदि प्रदर्शन इसके बाद, एक पल भी चलाया जायेगा,
तो प्रायोजकों पर, पाँच सौ रूपये प्रति पल प्रति प्रदर्शनकारी चार्ज लगाया जायेगा।
प्रशासन चाहता है,
कि प्रदर्शन में समाज के सभी वर्गों की भागीदारी हो,
प्रदर्शकों में पन्द्रह प्रतिशत अनुसूचित जाती, साढ़े सात जनजाती,
सत्त्ताईस में अन्य पिछड़े और तैंतीस प्रतिशत में अबला नारी हो।
इसके अतिरिक्त प्रस्तावित प्रतिरोध प्रदर्शन में,
प्रत्येक सम्प्रदाय का प्रतिनिधित्व होना चाहिये,
क्योंकि एक धर्मनिर्पेक्ष शासन प्रणाली में,
प्रदर्शन भी तो धर्मनिर्पेक्ष होना चाहिये।
प्रदर्शन के लिये प्रस्तावित पुलिस सुरक्षा का,
पूरा खर्चा प्रदर्शकों को खुद सहन करना होगा।
यदि शाँती व्यवस्था बिगड़ी,
तो पाँच लाख रूपये का अतिरिक्त आर्थिक दंड वहन करना होगा।
प्रदर्शन से प्राप्त आमदनी और खर्चे की कर-अधिकारियों द्वारा जाँच होगी,
उद्घाटित प्रायोजकों के व्यक्तिगत मामलों पर सार्वजनिक रूप से पूछताछ होगी।
यदि प्रायोजकों की छवि पूरी तरह से क्लीन होगी,
केवल तभी प्रदर्शन के लिये प्रशासन की सिग्नल ग्रीन होगी चाहिये।
प्रदर्शन कब, कहाँ और कैसे करना है,
ये प्रशासन बतायेगा,
तय राशी के अदायगी पर,
प्रदर्शन के लिये प्रमुख सुविधायें भी,
प्रशासन मुहैय्या करायेगा।
किंतु प्रदर्शन में प्रशासन के विरूद्ध,
कोई नारा नहीं होगा।
प्रशासनिक पदाधिकारी की कार्यप्रणाली पर भी प्रश्न,
गवारा नहीं होगा।
प्रशासन जानता है,
जनता साथ देगी,
प्रशासन के हाथ में,
हमेशा की तरह अपना हाथ देगी।
प्रशासन जनता की,
समस्त समस्याओं के समाधान हेतु तत्पर है,
और कुछ को तो बिल्कुल,
सुलझा देने की हद पर है।
प्रशासन का... अपना एक संविधान है,
जिसमें... प्रत्येक प्रश्न को सुलझाने का प्रावधान है।
परंतु.. प्रशासनिक प्रणाली में,
कुछ वक्त लगता है।
और इसीलिये प्रशासन जनता से,
ये उम्मीद रखता है,
प्रशासनिक मामलों में,
जनता सब्र करे।
और कुछ नहीं तो प्रशासन की प्रतिबद्धता,
पर ही फक्र करे।
प्रशासन, पहले से धन्यवाद प्रेषित करता है।
और मुनादी का अनुपालन अपेक्षित करता है।
आज्ञा से-
प्रशासन,
प्रजा की सेवा में तत्पर।
Thursday, September 8, 2011
एक्शन रीप्ले।
कुत्ते भौंकते रहे,
गधे रेंकते रहे,
हम घरों में बैठकर,
हाथ सेंकते रहे।
बम कहीं कोई फट गया,
घर कहीं कुछ ढह गये,
तमाशाई बस खड़े,
देखते ही रह गये।
कुछ तो बस घायल हुये,
कुछ वहीँ पे मर गये,
करने वाले आये भी,
और काम अपना कर गये।
पुलिस की आहट हुई,
ज़िंदे सारे डर गये,
मुर्दे और करते भी क्या,
वहीँ पर पसर गये।
लाशें सब छाँटी गईं,
शिनाख्त हुई, बाँटी गईं।
ज़िंदे खुद होकर खड़े,
पैबंद टाँक, चल पड़े।
लोगों ने हिसाब कर,
ज़िंदे अपने गिन लिये,
जिनके जो भी मर गये,
कीमत लगा निकल लिये।
हलक की तोपें चलीं
उंगलियाँ भी तन गईं,
हर तरफ हरकत हुईं,
कमैटियाँ कुछ बन गईं।
कानफाड़ू शोर से,
शाँती के वादे हुये,
घोषणायें अनगिनत,
पर सब के सब आधे हुये।
किसी ने कविता कही,
कुछ बहस कर चल दिये,
दो-चार की कर धर-पकड़,
पुलिस ने हाथ मल दिये।
चीख कर बैठे गले,
फिर खड़े जब हो गये,
रीप्ले का बटन दबा,
रिवाइन्ड सारे हो गये।
बम कहीं कोई फिर फटा,
घर कहीं फिर ढह गये,
तमाशाई अब भी बस,
देखते ही रह गये।
कुत्ते भौंकते रहे,
गधे रेंकते रहे,
हम घरों में बैठकर,
हाथ सेंकते रहे।
गधे रेंकते रहे,
हम घरों में बैठकर,
हाथ सेंकते रहे।
बम कहीं कोई फट गया,
घर कहीं कुछ ढह गये,
तमाशाई बस खड़े,
देखते ही रह गये।
कुछ तो बस घायल हुये,
कुछ वहीँ पे मर गये,
करने वाले आये भी,
और काम अपना कर गये।
पुलिस की आहट हुई,
ज़िंदे सारे डर गये,
मुर्दे और करते भी क्या,
वहीँ पर पसर गये।
लाशें सब छाँटी गईं,
शिनाख्त हुई, बाँटी गईं।
ज़िंदे खुद होकर खड़े,
पैबंद टाँक, चल पड़े।
लोगों ने हिसाब कर,
ज़िंदे अपने गिन लिये,
जिनके जो भी मर गये,
कीमत लगा निकल लिये।
हलक की तोपें चलीं
उंगलियाँ भी तन गईं,
हर तरफ हरकत हुईं,
कमैटियाँ कुछ बन गईं।
कानफाड़ू शोर से,
शाँती के वादे हुये,
घोषणायें अनगिनत,
पर सब के सब आधे हुये।
किसी ने कविता कही,
कुछ बहस कर चल दिये,
दो-चार की कर धर-पकड़,
पुलिस ने हाथ मल दिये।
चीख कर बैठे गले,
फिर खड़े जब हो गये,
रीप्ले का बटन दबा,
रिवाइन्ड सारे हो गये।
बम कहीं कोई फिर फटा,
घर कहीं फिर ढह गये,
तमाशाई अब भी बस,
देखते ही रह गये।
कुत्ते भौंकते रहे,
गधे रेंकते रहे,
हम घरों में बैठकर,
हाथ सेंकते रहे।
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